अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
संवर्त्तस्मृतिः ॥ १७
अष्टौभिक्षाःसमादाय समुनिःसप्तपंचवा ॥१०७ ॥
अद्भिःप्रक्षाल्यताःसर्वा भुंजीतसुसमाहितः ।
अरण्येनिर्जनेतत्र पुनरासीतमुक्तवान् ॥ १०८ ॥
एकाकीचिंतयेन्नित्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
मृत्युंचनाभिनंदेत जीवितंवाकथंचन ॥ १०९ ॥
कालमेवप्रतीक्षेत यावदायुः समाप्यते ।
संसव्यचाश्रमान्सर्वान् जितक्रोधोजितेंद्रियः ॥११०॥
ब्रह्मलोकमवाप्नोति वेदशास्त्रार्थविद्विजः ।
आश्रमेषुचसर्वेषु प्रोक्तोयं प्राश्निकोविधिः ॥१११ ॥
अतःपरं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिंशुभम् ।
ब्रह्मघ्नश्चसुरापश्च स्तेयीचगुरुतल्पगः ॥ ११२ ॥
महापातकिनस्त्वेते तत्संयोगीचपंचमः ।
ब्रह्मघ्नश्चवनंगच्छे द्वल्कवासाजटीध्वजी ॥११३॥
त्मविद्या में तत्पर और विचारवान् हो वह सन्यासी आठ वा सात वा पांच घरसेभिक्षा ग्रहण करके ॥ १०७ ॥ उन सब भिक्षाओं को जल से धोकर सावधानी से भोजन करे और फिर जहां कोई जन न हो ऐसे वन में मुक्ति का अभिलाषी संन्यासी बैठे ॥ १०८ ॥ मन वाणी देह और कर्म से एकाकी नित्य ब्रह्म का विचार करे मरने और जीने को कभी भी प्रशंसा न करे ॥ १०९॥ इस प्रकार जब तक अवस्था समाप्त हो काल की प्रतीक्षा करे क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर चारों आश्रमों का सेवन करके ॥ ११० ॥वेद और शास्त्र के अर्थ का जानने वाला ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है— यह चारों आश्रमों के प्रश्न [ जो तुमने पूछा था ] की विधि कही ॥ १११ ॥ इससे आगे प्रायश्चित्त के उत्तम विधान को कहते हैं ब्रह्महत्यारा मदिरा पीने वाला और गुरू की शय्या पर गमन करने वाला ॥ ११२ ॥ ये चारों और पांचवां इनका संगी महापातकी होते हैं ब्रह्महत्यारा वन में चला जाय और वल्कल जटा तथा शिरकटे पुरुष की तस्वीर ध्वजा में कपोड़ी इन को रक्खे ॥ ११३॥
३
१८ ॥ पाराशर्यसंहिता ॥
वन्यान्येवफला-न्यश्नन् सर्वकामविवर्जितः ।
भिक्षार्थीविचरेद्ग्रामं वन्यैर्यदिनजीवति ॥ ११४ ॥
चातुर्वर्ण्यञ्चरेद्भैक्ष्यं खट्वांगीसंयतःसदा ।
भिक्षास्त्वेवंसमादाय वनंगच्छेत्ततःपुनः ॥ ११५ ॥
वनवासीसपापःस्या-त्सदाकालमतंद्रितः ।
ख्यापयन्मुच्यतेपापा-द्ब्रह्महापापकृत्तमः ॥ ११६ ॥
अनेनतुविधानेन द्वादशाब्दव्रतंचरेत् ।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वभूतहितेरतः ॥ ११७ ॥
ब्रह्महत्यापनीदाय ततोमुच्येतकिल्विषान् ।
अतःपरंसुरापस्य निष्कृतिंश्रोतुमर्हथ ॥ ११८ ॥
गौड़ीमाध्वीचपैष्टीच विज्ञेयात्रिविधासुरा ।
यथैवैकातथासर्वा नपातव्याद्विजोत्तमैः ॥ ११९ ॥
सुरापस्तुसुरांतप्तां पिबेत्तन्पापमोक्षकः ।
संपूर्ण कामों को त्याग कर वन के ही फल मूल खावे यदि उनसे जीवन का निर्वाह न हो तो भिक्षा के अर्थ गांव में भ्रमण करे ॥ चारों वर्णों से भिक्षा मांगे तथा हत्या के चिन्ह को बांधे रहे और मन को सदा वश में रक्खे इस प्रकार भिक्षा लेकर फिर वन में चला जाय ॥ ११५ ॥ यह पापी ( हत्यारा ) आलस्य को छोड़ कर सदा वन में ही वास करे बड़ा भी पापी अपने पाप को प्रसिद्ध करता हुआ पाप से छूटता है ॥ ११६ ॥ इस रीति से बारह वर्ष का व्रत करे और सब इन्द्रियों को रोक कर सब भूतों के हित में तत्पर रहे ॥ ११७ ॥ ब्रह्महत्या के दूर करने के लिये पूर्वोक्त आचरण करे पुनः पाप से मुक्त होता है । अब मदिरा पीने वाले का प्रायश्चित्त सुनो ॥ ११८ ॥ गौड़ी (गुड़ की) माध्वी [महुवा की] पैष्टी (पिसी दवा या चून आदि की) यह तीन प्रकार की मदिरा होती है इनमें जैसी एक वैसी ही सब हैं इस से ब्राह्मणादि उत्तम द्विज मदिरा को कदापि न पीवें ॥ ११९ ॥ मदिरा पीने वाला ब्राह्मण उस के पीने के पाप से छूटा चाहे तो तपाई हुई मदि-
संवर्त्तस्मृतिः ॥ १८
गोमूत्रमग्निवर्णंवा गोमयंवातथाविधम् ॥ १२० ॥ घृतंवात्रीणिपेयानि सुरापोव्रतमाचरेत् । मुच्यतेतेनपापेन प्रायश्चित्तेकृतेसति ॥ १२१ ॥ अरण्येवावसेत्सम्यक् सर्वकामविवर्जितः । चांद्रायणानिवात्रीणि सुरापोव्रतमादिशेत् ॥ १२२ ॥ एवंशुद्धिःसुरापस्य भवेदितिनसंशयः । मद्यभांडोदकंपीत्वा पुनःसंस्कारमर्हति ॥ १२३ ॥ स्तेयंकृत्वासुवर्णस्य स्तेयंराज्ञेनिवेदयेत् । ततोमुशलमादाय स्तेनंहन्यात्सकृन्नृपः ॥ १२४ ॥ यदिजीवतिसस्तेन-स्ततःस्तेयाद्विमुच्यते । अरण्येचीरवासावा चरेद्ब्रह्महणोव्रतम् ॥ १२५ ॥ एवंशुद्धिःकृतास्तेये संवर्तवचनंयथा । गुरुतल्पेशयानस्तु तप्तेस्वप्यादयोमये ॥१२६॥
वा अथवा अग्नि से तपाये गोमूत्र वा गोबर को पीवे ॥ १२० ॥ अथवा तपा घी ये गोमूत्रादि तीन ही पीने योग्य हैं अर्थात् तपायी हुई मदिरा पीना अच्छा नहीं । गोमूत्रादि किसी को पीकर मर जावे मद्य पीने वाला इस व्रत को करे इस प्रायश्चित्त के कर लेने पर मद्यपान के पाप से छूट जाता है ॥ १२१ ॥ अथवा सम्यक् प्रकार सर्वकामनाओं को छोड़ कर वन में बसे यद्वा मदिरा पीने वाला तीन चांद्रायण प्रायश्चित्त करे ॥ १२२ ॥ इस प्रकार मदिरा पीने वाले की शुद्धि होती है इस में संदेह नहीं है । मदिरा के पात्र का जल पीकर फिर उपनयन संस्कार के योग्य होता है ॥१२३॥ सोने की चोरी करके उस चोरी का अपराध राजा से निवेदन कर तब राजा मूशल लेकर एक बार उस चोर के मार दे ॥ १२४ ॥ यदि वह चोर जीवित हो जावे तो चोरी के पाप से मुक्त हो जाता है अथवा वन में जाकर पड़े हुये फटे वस्त्र पहन कर ब्रह्महत्या का व्रत करे ॥ १२५ ॥ संवर्तऋषि के वचनानुसार इस प्रकार सुवर्ण चोरी की शुद्धि विहित है गुरु की शय्या पर गमन करके तपाये हुए लोहे के पात्र [कड़ाही] में शयन करके शरीर को छोड़े ॥ १२६ ॥
२० भाषाथंसहिता ॥
समालिङ्गेत्स्त्रियंवापि दीप्तांकाष्णायसींऋताम् । चान्द्रायणानिकुर्याच्च चत्वारित्रीणिवाद्विजः ॥१२७॥ मुच्यतेचततःपापात् प्रायश्चित्तेकृतेसति । एभिःसम्पर्कमायाति यःकश्चित्पापमोहितः ॥१२८॥ तत्तत्पापविशुद्ध्यर्थं तस्यतस्यव्रतंचरेत् । क्षत्रियस्यवधंकृत्वा त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥१२९॥ कुर्याच्चैवानुरूपेण त्रीणिकृच्छ्राणिसंयतः । वैश्यहत्यान्तुसंप्राप्तः कथंचित्काममोहितः ॥१३०॥ कृच्छ्रातिकृच्छ्रौकुर्वीत पनरौवैश्यघातकः । कुर्याच्छूद्रवधेविप्र-स्तप्तकृच्छ्रंयथाविधि ॥१३१॥ एवंशुद्धिमवाप्नोति संवर्त्तवचनंयथा । गोघ्नस्यातःप्रवक्ष्यामि निष्कृतिंतत्त्वतःशुभाम् ॥१३२॥
अथवालोहे की स्त्री बना कर और उसे लाल तपा कर लिपट कर के मरे अथवा द्विज चार वा तीन चान्द्रायण व्रत करे ॥१२७॥ पुनः प्रायश्चित्त करने के अनन्तर उस पापसे मुक्त होता है। जो कोई पाप से मोहित पुरुष इनसे सम्बन्ध करता है ॥१२८॥ वह भी उस पाप की शुद्धि के लिये उसी २ पाप का प्रायश्चित्त करे—क्षत्रिय को मार कर ब्राह्मण तीन कृच्छ्रों से सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥१२९॥ यथोचित तीन कृच्छ्र सावधान होकर करे । जो काम से मोहित मनुष्य कदाचित् वैश्य की हत्या करे॥१३०॥तो वैश्य का घातक वह मनुष्य कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र व्रत करे और शूद्र के मारने में ब्राह्मण विधि से तप्तकृच्छ्र व्रत करे ॥१३१॥ संवर्त्त के वचनानुसार इस प्रकार शुद्धि को प्राप्त होता है अब गोहिंसा करने वाले का यथार्थ उत्तम प्रायश्चित्त कहते हैं ॥१३२॥ गौ को जो मारे वह गौशाला में और गौ के समीप अपना संस्कार करे और गौशाला में ही इन्द्रियों को वश में रख कर पन्द्रह दिन तक पृथिवी पर सोवे ॥ १३३ ॥
संवर्त्तस्मृतिः ॥ २१
गोघ्नःकुर्वीतसंस्कारं गोष्ठेगोरुपसन्निधौ ।
तत्रैवक्षितिशायीस्या-न्मासाद्धं संयतेन्द्रियः ॥१३३॥
स्नानंत्रिषवणंकुर्या-न्नखलोमदिवर्जितः ।
सक्तुयावकभिक्षाशी पयोदधिशकृन्नरः ॥१३४॥
एतानिक्रमशोऽश्नीयाद् द्विजस्तत्पापमोक्षकः ।
गायत्रींचजपेन्नित्यं पवित्राणिचशक्तितः ॥१३५॥
पूर्णेचैवार्द्धमासेच सविप्रान्भोजयेद्द्विजः ॥
भुक्तवत्सुचविप्रेषु गांचदद्याद्विचक्षणः ॥ १३६ ॥
व्यापन्नानांबहूनांतु रोधनेबन्धनेपिवा ।
भिषङ्मिथ्योपचारेच द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥ १३७ ॥
एकाचेद्बहुभिः काचि-द्दैवाद्व्यापादिताक्वचित् ।
पादंपादांतुहत्याया-श्चरेयुस्तेपृथक्पृथक् ॥ १३८ ॥
यंत्रणेगोश्चिकित्सार्थे गूढगर्भविमोचने ।
यदियतविपत्तिःस्या-न्नसपापेनलिप्यते ॥ १३६ ॥
औषधंस्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषुच ।
वह मनुष्य तीन काल स्नान करे और नख तथा लोम इन को न रक्खे-
सत्तू जौ दूध-दही और गोबर ॥ १३४ ॥ इन को क्रम से गोहत्या के पाप से मुक्ति चाहने वाला द्विज भोजन करे-और यथाशक्ति गायत्री तथा अन्य पवित्र मंत्रों को नित्य जपे ॥ १३५ ॥ जब आधा महीना व्यतीत होजाय तब वह द्विज ब्राह्मणों को भोजन करावे जब ब्राह्मण भोजन कर चुकें उस समय गोदान भी करे ॥ १३६ ॥ रोकने अथवा बांधने में अथवा विरुद्ध चिकित्सा से बहुत गौ मर जांय तो गोहत्या का द्विगुण व्रत करे ॥ १३७ ॥ यदि कदाचित् कोई एक गौ बहुतों ने मारडाली हो तो वे पृथक् २ गोहत्या का चौथाई प्रायश्चित्त करें ॥ १३८ ॥ चिकित्सा के अर्थ वश करने में अथवा गूढ़ [ मरे हुए ] गर्भ के निकालने में यदि किसी से गौ मरजाय तो वह पाप का भागी नहीं होता ॥ १३९ ॥
२२ भाषाऽर्थसहिता ॥
दीयमाने विपत्तिःस्या-त्पुण्यमेवनपातकम् ॥१४०॥ प्रायश्चित्तस्यपादं तु रोधेषुव्रतमाचरेत् । द्वौपादौबंधनेचैव पादोनंयंत्रणेतथा ॥ १४१ ॥ पाषाणैर्लगुडैर्दण्डै-स्तथाशस्त्रादिभिर्नरः । निपातनेचरेत्सर्वं प्रायश्चित्तंदिनत्रयम् ॥ १४२ ॥ हस्तिनंतुरगंहत्वा महिषोष्ट्रंकपिन्तथा । एषांवधेद्विजःकुर्या-त्सप्तरात्रमभोजनम् ॥ १४३ ॥ व्याघ्रंश्वानंखरंसिंहं ऋक्षंसूकरमेवच । एतान्हत्वाद्विजोमोहात् त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१४४॥ सर्वासामेवजातीनां मृगाणांवनचारिणाम् । अहोरात्रोषितस्तिष्ठे-ज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १४५ ॥ हंसंक्रांकंबलाकाञ्च बर्हिकारंडवावपि । सारसंचामभासौच हत्वात्रिदिवसंसंक्षिपेत् ॥१४६॥ चक्रवाकंतथाक्रौंचंसारिकाशुकतित्तिरीन् ।
औषध घी अथवा भोजन देने से यदि गौ वा ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त होजावे तो पुण्य ही होता है पाप नहीं ॥ १४० ॥ रोकने से यदि गौ मरे तो चौथाई प्रायश्चित्त और बांधने से आधा और वश में करनेसे मरे तो पादोन [पौन] करे ॥ १४१॥ पत्थर सोटा डण्डा और शस्त्र इन से धमकानेपर गौ मर जाय तो तीन दिन तक पूरा प्रायश्चित्त करे ॥ १४२ ॥ हाथी-घोड़ा-भैंस ऊंट-और वानर-इनके मारने पर द्विज सात दिन तक भोजन न करे ॥ १४३ ॥ बाघ कुत्ता-गधा-सिंह-ऋक्ष और सूकर इनको अज्ञान से मार कर तीन दिनके व्रतसे रात्रमें शुद्ध होता है ॥१४४॥ वनमें विचरते संपूर्ण जाति के मृगों के मारनेमें एक दिनरात उपवास करके अग्नि देवता वाले मन्त्रका जप करता हुआ खड़ा रहे ॥१४५॥ हंस कौआ वगला मोर कारंडव (हंसभेद) सारस और पपीहा इन पक्षियोंको मारकर तीन दिन उपवास करे ॥ १४६ ॥ चकवा-क्रूंच-मैना-
संवर्त्तस्मृतिः ॥ २३
श्येनगृध्रानुलूकांश्च पारावतमथापिवा ॥ १४७ ॥ टिट्टिभंजालपादंच कोकिलंकुकुटंतथा । एषांवधेनरःकुर्या देकरात्रमभोजनम् ॥ १४८ ॥ पूर्वोक्तानांतुसर्वेषां हंसादीनामशेषतः । अहोरात्रोषितस्तिष्ठे-ज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १४९ ॥ मण्डूकंचैवह्नन्वाच सर्पमार्जारमूषकम् । त्रिरात्रोपोषितस्तिष्ठे-त्कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥१५०॥ अनस्थीन्ब्राह्मणोहत्वा प्राणायामेनशुद्ध्यति । अस्थिमतांवधेविप्रः किंचिद्दद्याद्विचक्षणः ॥१५१॥ यश्चांडालींद्विजोगच्छे-त्कथंचित्काममोहितः । त्रिभिःकृच्छ्रै स्तुशुद्ध्येत,प्राजापत्यानुपूर्वकैः ॥१५२॥ पुंश्चलीगमनंकृत्वा कामतोकामतोषिवा । कृच्छ्रंचांद्रायणंतस्य पावनंपरमंस्मृतम् ॥ १५३ ॥
होता-तीतर, श्येन-गीध-उल्लू-कबूतर ॥ १४७ ॥ टिट्टिभ (टटीरी) जालपाद (हंसभेद) कोयल और मुरगा इन के मारने में मनुष्य एक दिन उपवास करै ॥१४८॥ पूर्व कहे सर्व जीव तथा विशेष कर हंस आदि के मारने में एक दिन रात उपवास करके अग्निमंत्र का जप करता हुआ खड़ा रहे ॥ १४९ ॥ मेंडक-सांप-बिलाव और मूसा-इन को मार कर तीन उपवास करैनया ब्राह्मणों को भोजन करावै॥१५०॥जिन में हड्डी न हो ऐसे मक्खीमच्छरादि जीवों को हनन कर ब्राह्मण प्राणायाम से शुद्ध होता है और जिन में हड्डी हैं ऐसे क्षुद्र जीवों के मारने में कुछदान करै ॥१५१॥ जो काम से मोहित हुआ द्विज चांडाली के संग गमन करै वह क्रम से प्राजापत्य आदि तीन कृच्छ्रों से शुद्ध होता है ॥ १५२ ॥ ज्ञान से अथवा अज्ञानसे जो व्यभिचारिणी के संग गमन करै उसके कृच्छ्र तथा चांद्रायण ये दोनों व्रत परम संशोधक हैं ॥ १५३ ॥ नटिनी-धोबिन-बांस और चमड़े से जीने वाली इन के संग प्रमाद से गमन करके द्विज चांद्रायण व्रत करै ॥१५४ ॥
२४ भाषार्थसहिता ॥
शैलूषोरजकीञ्चैव वेणुचर्मोपजीविनी । एतागत्वा द्विजोमोहा-च्चरेच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १५४॥ क्षत्रियामथवैश्यांवा गच्छेद्यःकाममोहितः । तस्यसांतपनःकृच्छ्रो भवेत्पापापनोदनः ॥ १५५ ॥ शूद्रांतुब्राह्मणोगत्वा मासमासार्द्धमेववा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ १५६ ॥ विप्रामस्वजनांगत्वा प्रजापत्येनशुद्ध्यति । स्वजनांतुद्विजोगत्वा प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥१५७॥ क्षत्रियांक्षत्रियोगत्वा तदेवव्रतमाचरेत् । नरोगोगमनंकृत्वा कुर्याच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १५८ ॥ मातुलानींतथाश्वश्रूं सुतांवैमातुलस्यच । एतागत्वास्त्रियोमोहा-त्पराकेणविशुद्ध्यति ॥ १५९ ॥ गुरोर्दुहितरंगत्वा स्वसारंपितुरेवच । तस्यदुहितरंचैव चरेच्चांद्रायणंव्रतम् ॥ १६० ॥
क्षत्रिया अथवा वैश्या के संग जो काम में मोहित हुआ ब्राह्मण गमन करता है उस के पाप का पृथक् करने वाला सांतपन कृच्छ्र व्रत है ॥१५५॥ एक मास अथवा पंद्रह दिन तक शूद्रा के साथ गमन करके-पंद्रह दिन तक गोमूत्र और जौको खाकर शुद्ध होता है॥१५६॥ जिसके कोई पुरुष न हो ऐसीब्राह्मणी केसंग गमन करके प्राजापत्य से शुद्ध होता है पुत्रादिवालीब्राह्मणीस्त्री के संग भी गमनसे द्विज प्राजापत्य व्रत से शुद्ध होता है॥१५७॥ क्षत्रिय क्षत्रिया के सग भोग करके प्राजापत्य व्रत ही करै । और मनुष्य गौके संग गमन करके चांद्रायण व्रत करै ॥१५८॥ मामा की स्त्री-सास और मामा की पुत्री इनके संग भूल से गमन करके पराक (बारह दिन का उपवास) व्रत करने से सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥१५९॥ गुरुकी पुत्री-पिताकी बहन और-फूफा की पुत्री इनके संग भोग करके चांद्रायण व्रत करै ॥ १६१ ॥
६
संवर्तस्मृतिः ॥ २५
पितृव्यदारगमने भ्रातृभार्यागमेतथा ।
गुरुतल्पव्रतं कुर्या-न्निष्कृतिर्नान्यथाभवेत् ॥ १६२ ॥
पितृभार्यांसमारुह्य मातृवर्जां नराधमः ।
भगिनीं मातुलसुतां स्वसारंचान्यमातृजाम् ॥ १६३ ॥
एतास्तिस्र स्त्रियोगत्वा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ।
कुमारीगमने चैव व्रतमेतत्समाचरेत् ॥ १६४ ॥
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यं विधीयते ।
सखिभार्यां कुमारींच श्वश्रूंवाश्यालिकांतथा ॥१६५॥
मातरंयोधिगच्छेच्च स्वसारंपुरुषोधमः ।
नतस्यनिष्कृतिंदद्या-त्स्त्रांचैवतनुजांतथा ॥ १६६ ॥
नियमस्थांत्रतस्थांवा योभिगच्छेत्तिस्त्रियंद्विजः ।
सकुर्यात्प्राकृतंकृच्छ्रं धेनुंदद्यात्पयस्विनीम् ॥ १६७ ॥
रजस्वलांतुयोगच्छेद् गर्भिणींपतितांतथा।
चाचा की स्त्री चाची और भौजाई इनके संग भोग करने में गुरु की स्त्री के गमन का प्रायश्चित्त करे अन्यथा पाप की निवृत्ति नहीं होती ॥१६२॥ माता से अन्य पिता की स्त्री-और मामा की पुत्री अपनी बहिन-तथा दूसरी माता में उत्पन्न हुई अपनी भगिनी ॥ १६३ ॥ इन तीनों स्त्रियों के संग कोई नीच प्रकृति मनुष्य भोग करे तो तप्तकृच्छ्र व्रत करे और कुमारी ( जिसका विवाह न हुआ हो ) के गमन में भी यही कृच्छ्र करे ॥१६४॥ पशु और वेश्या के गमन में प्राजापत्य व्रत करे-मित्र की स्त्री-सासु और साले की स्त्री ॥ १६५ ॥ माता-बहिन-और अपनी लड़की इनके संग जो पुरुषों में नीच भोग करता है उसका प्रायश्चित्त नहीं है ॥१६६॥ नियम तथा व्रत में स्थित स्त्री के संग जो द्विज भोग करता है वह प्राकृत कृच्छ्र व्रत करे और दूध देती हुई गौ का दान करे ॥१६७। रजस्वला-गर्भवती और पतित स्त्री के संग जो पुरुष भोग करता है उस को
४
| ३६ | भाषाटीकासहिता ॥ |
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तस्यपापविशुद्ध्यर्थ-मतिकृच्छ्रोविधीयते ॥ १६८ ॥
वैश्यजां ब्राह्मणोगत्वा कृच्छ्रमेकंसमाचरेत् ।
एवंशुद्धिःसमाख्याता संवर्तस्यवचोयथा ॥१६९॥
कथंचिद्ब्राह्मणींगत्वा क्षत्रियोवैश्यएवच ।
गोमूत्रयावकाहारो मासेनेकेनशुद्ध्यति ॥१७०॥
शूद्रस्तुब्राह्मणींगच्छे-त्कदाचित्काममोहितः
गोमूत्रयावकाहारो मासेनेकेनशुद्ध्यति ॥१७१॥
ब्राह्मणीशूद्रसंपर्कं कदाचित्समुपागता ।
कृच्छ्रचांद्रायणंतस्याः पावनंपरमंस्मृतम् ॥ १७२ ॥
चांडालंपुल्कसंचैव श्वपाकंपतितंतथा ।
एताःश्रेष्ठःस्त्रियोगत्वा कुर्याच्चान्द्रायणंत्रयम् ॥१७३॥
अतःपरंप्रदुष्टानां निष्कृतिंश्रोतुमर्हथ ।
संन्यस्यदुर्मतिःकश्चि-दपत्यार्थंस्त्रियंव्रजेत् ॥ १७४ ॥
पाप निवृत्ति के अर्थ अतिकृच्छ्र व्रत कहा है ॥ १६८ ॥ वैश्य की कन्या के संग भोग करके ब्राह्मण एक कृच्छ्र व्रत करे। संवर्त ऋषि के वचन के अनुसार इस प्रकार शुद्धि कही है ॥ १६९ ॥ क्षत्रिय और वैश्य कदाचित् ब्राह्मणी के संग भोग करें तो गोमूत्र और जौंको खाकर एक मास में शुद्ध होते हैं ॥ १७० ॥ यदि कदाचित् काम से मोहित हुआ शूद्र ब्राह्मणी के संग गमन करे तो गोमूत्र और जौं को खाकर एक महीने में शुद्ध होता है। १७१॥ कदाचित् ब्राह्मणी ही शूद्र के संग भोग करे तो उस ब्राह्मणी का पवित्र करने वाला कृच्छ्र चांद्रायण व्रत कहा है ॥ १७२ ॥ चांडाल पुल्कस श्वपाक और पतित इन की स्त्रियों के संग श्रेष्ठ (द्विजाति) पुरुष गमन करके तीन चांद्रायण व्रत करे ॥ १७३ ॥ इस से आगे अत्यंत दुष्टों का प्रायश्चित्त सुनो । यदि कोई दुष्ट बुद्धि पुरुष संन्यास लेकर संतान के लिये स्त्री का संग करता है ॥ १७४ ॥
संवर्त्तस्मृतिः ॥ २७
कुर्यात्कृच्छ्रं समानं तन् षण्मासांस्तदनंतरम् । विषाग्निश्यामशबला स्तेषामपिविनिर्द्दिशेत्॥१७५॥ स्त्रीणांचतथाचरणे गर्ह्याभिगमनेषु । पतनेष्वप्ययंदृष्टः प्रायश्चित्तविधिःशुभः ॥१७६॥ नृणांविप्रतिपत्तौच पावनःप्रेत्यचेहच । गोविप्रप्रहतेचैव तथाचैवात्मघातिनि ॥ १७७ ॥ नैवाश्रुपतनंकार्यं सद्भिःश्रेयोभिकांक्षिभिः । एषामन्यतमंप्रेतं योवहेत्तद्दहेत्तथा ॥ १७८ ॥ कृत्वाचोदकदानंतु चरेच्चांद्रायणंव्रतम् । तच्छवंकेवलंस्पृष्ट्वा अश्रुनोपातितंयदि ॥ १७६ ॥ पूर्वकेष्वपकारीचे-देकाहंक्षपणंतथा । महापातकिनांचैव तथाचैवात्मघातिनाम् ॥ १८० ॥ उदकंपिंडदानंच श्राद्धंचैवहियत्कृतम् । नोपतिष्ठतितत्सर्वं राक्षसैर्विप्रलुप्यते ॥ १८१ ॥
तो वह निरंतर छः मास पर्यन्त कृच्छ्रव्रत करै और विष तथा अग्निसे जो काले और कबरे हो जांय वे भी पूर्वोक्त कृच्छ्रव्रत ही करें ॥ १७५ ॥ स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहने व्रत करने का नियम करके संतान के लिये पुनः गृहस्थ की इच्छा हो तथा निन्दित स्त्रीयों के साथ व्यभिचार करनेपर स्त्रियोंको भी पूर्वोक्त ही प्रायश्चित्त कहा है। जाति मे पतित होने के कामों में भी ऋषियों ने यही प्रायश्चित्त अच्छा कहा है ॥ १७६ ॥ मनुष्यों के परस्पर विरोध में पूर्वोक्त कृच्छ्र इस लोक और परलोक में पवित्र करने वाला है। गो और ब्राह्मण से मरा तथा जो आत्मघात से मरा हो ॥ १७७ ॥ इनका मरण होने पर अपने हितके अभिलाषी सज्जन आंसू न गिरावें और इन में से किसी मुर्दाको जो श्मशानमें लेजाय अथवा जलावे ॥ १७८ ॥ उ ने यदि आंसू न गिराये हों तो जलदान तथा उस मुर्दे का केवल स्पर्श करके चान्द्रायण व्रत करे ॥१७९॥ तथा पूर्वोक्त प्रायश्चित्त न कर सकता हो तो एक दिन उपवास करै महापातकी और आत्मघाती ॥ १८० ॥ इनको जल दान पिंडदान श्राद्ध जो किया हो वह सब नहीं मिलता उसे राक्षस नष्ट करदेते हैं ॥ १८१॥
२८ माधायंसंहिता ॥
चांडालैस्तुहतायेतु द्विजादंष्ट्रिसरीसृपैः । श्राद्धंतेषांनकत्तंव्यं ब्रह्मदंडहताश्चये ॥ १८२ ॥ कृत्वामूत्रपुरीषंतु भुक्त्वोच्छिष्टस्तथाद्विजः । श्वादिस्पृष्टोजपेद्देव्याः सहस्रंस्नानपूर्वकम् ॥ १८३ ॥ चांडालंपतितंस्पृष्ट्वा शवमंत्यजमेवच । उदक्यांसूतिकांनारीं सवासाःस्नानमाचरेत् ॥ १८४ ॥ स्पृष्टेनसंस्पृशेद्यस्तु स्नानंतस्यविधीयते । ऊर्ध्वमाचमनंप्रोक्तं द्रव्याणांप्रोक्षणंतथा ॥ १८५ ॥ चांडालाद्यैस्तुसंस्पृष्ट उच्छिष्टश्चेद्विजोत्तमः । गोमूत्रयावकाहार स्त्रिरात्रेणविशुद्ध्यति॥ १८६ ॥ शुनापुष्पवतीस्पृष्टा पुष्पवत्यान्ययातथा । शेषाण्यहान्युपवसे-त्स्नात्वाशुद्ध्येद्घृताशना ॥१८७॥
जो चांडाल दाढ़वाले (कुत्ता आदि) सांप और ब्राह्मण का शाप इन से जो द्विज मरे हों उनके लिये श्राद्ध नहीं करना चाहिये॥१८२॥ भोजनसे उच्छिष्ट ब्राह्मण को तथा जिसने मूत्र और मल का त्याग किया हो उसको यदि कुत्ता आदि स्पर्श कर लें तोवह स्नान करके एक सहस्र गायत्री का जप करे ॥१८३॥ चांडाल-पतित, मुर्दा अंत्यज रजस्वला और दश दिन के भीतर सूतिका स्त्री इनका स्पर्श करके सचैल स्नान करे ॥ १८४ ॥ इनके स्पर्श करने वाले ने जिसका स्पर्श किया हो वह स्नान ही करे पुनः आचमन करे और द्रव्यों (वस्त्र आदि) को जल से छिड़क ले ॥ १८५ ॥ यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण को चांडाल आदि स्पर्श करले तो गोमूत्र और जौंकी खाकर तीनदिनमें शुद्ध होता है ॥१८६॥ यदि रजस्वला स्त्री को कुत्ता वा अन्य रजस्वला स्त्री स्पर्श करले तो शुद्धि के जो दिन बाकी हों उन में उपवास करे फिर स्नान करके घी के खाने से शुद्धि होती है ॥ १८७ ॥
संवर्त्तस्मृतिः ॥ २९
चांडालभांडसंस्पृष्टं पिबेत्कूपगतंजलम् ।
गोमूत्रयावकाहार-स्त्रिरात्रेणविशुद्ध्यति ॥१८८॥
अन्त्यजैःस्वीकृतेतीर्थे तडागेषुनदीषुच ।
शुद्ध्यतेपञ्चगव्येन पीत्वातोयमकामतः ॥१८९॥
सुराघटप्रपातोयं पीत्वानासाजलंतथा ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्यंपिबेद्विजः ॥१९०॥
कूपेविण्मूत्रसंस्पृष्टाः प्राश्यचापोद्विजातयः ।
त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यन्ति कुम्भेसान्तपनंस्मृतम् ॥१९१॥
वापीकूपतडागाना-मुपहतानांविशोधनम् ।
अपांघटशतोद्धारः पञ्चगव्यंचनिक्षिपेत् ॥१९२॥
स्त्रीक्षीरमाविकम्पीत्वा सन्धिन्द्याचैवगोःपयः ।
तस्यशुद्धिस्त्रिरात्रेण द्विजानांचैवभक्षणे ॥१९३॥
विण्मूत्रभक्षणेचैव प्राजापत्यंसमाचरेत् ।
चांडाल के पात्र का जिस में स्पर्श हुआ हो ऐसे कुये के जल को पीकर गोमूत्र और जौं को खाकर तीन दिन में शुद्ध होता है ॥ १८८ ॥ नदी तथा तालाबों के जिस घाट पर भंगी आदि अन्त्यज स्नानादि सदा करते हों वहां के जल को भूल से पीकर पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ १८६ ॥ द्विज पुरुष मदिरा के घड़े तथा प्याऊ के और नासिका से जल को पीकर एक दिन उपवास करके पंचगव्य पीवे ॥१९०॥ द्विज लोग विष्ठा मूत्र मिश्रित कूप के जल को पीकर तीन दिन के उपवास से शुद्ध होते और विष्ठादि मिले घड़े के जल को पीने पर सांतपन कृच्छ्र व्रत से शुद्ध होते हैं ॥१९१॥ अपवित्र वस्तु जिन में पड़ा हो ऐसे बावड़ी-कूप और तालाब इन का संशोधन इस प्रकार होता है कि सौ घड़े जल के निकाल कर उस में पंचगव्य डाल दे ॥१९२॥ मनुष्य स्त्री, भेड़ और संधिनी ( जो गर्भवती हो परन्तु दूध भी देती हो ऐसी ) गौ इन के दूध को जो पीवे उस की शुद्धि तीन दिन उपवास और ब्राह्मणों को भोजन कराने से होती है ॥ १९३ ॥ विष्ठा और मूत्र के भक्षण में प्राजापत्य व्रत करे तथा कुत्ता
३० भाषाधर्मसंहिता ॥
श्वकाकच्छिष्टगोच्छिष्टं भक्षणेतुत्र्यहंद्विजः ॥१९४॥
विडालमूषिकोच्छिष्टे पञ्चगव्यंपिबेद्विजः ।
शूद्रोच्छिष्टंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१९५॥
पलाण्डुलशुनंजग्ध्वा तथैवग्रामकुक्कुटम् ।
छत्राकंविरुराहञ्च चरेत्सान्तपनंद्विजः ॥१९६॥
श्वविडालखरोष्ट्राणां कपेर्गोमायुकाकयोः ।
प्राश्यमूत्रपुरीषंच चरेच्चान्द्रायणव्रतम् ॥१९७॥
अन्नंपर्युषितंभुक्त्वा केशकीटैरुपद्रुतम् ।
पतितैःप्रेक्षितंचापि पंचगव्यंद्विजःपिबेत् ॥१९८॥
अन्त्यजाभाजनेभुक्त्वा ह्युदक्याभाजनेतथा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥१९९॥
गोमांसंमानुषंचैव शुनोहस्तात्समाहृतम् ।
अभक्ष्यंतद्भवेत्सर्वं भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥२००॥
कौआ और गौ इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके द्विज तीन दिन उपवास करे ॥१९४॥ बिलाव और मूसा इन के उच्छिष्ट को भक्षण कर द्विज पंचगव्य पीवे । तथा शूद्र के उच्छिष्ट को खाकर तीन दिन के उपवास करने से शुद्ध होता है ॥१९५॥ पलांडु (प्याज) लस्सन और गांव के मुर्गा का मांस-छत्राक (कठ फूल जिस के ऊपर छत्रीसी होती है वर्षा में पैदा होता है) और विष्ठा खाने वाले सूकर के मांस को खाकर द्विज सांतपन व्रत करे ॥१९६॥ कुत्ता-बिलाव-गधा-ऊंट-वानर गीदड़ और कौआ इन के मूत्र वा विष्ठा को खाकर चांद्रायण व्रत करे ॥१९७॥ जो अन्न बासा हो-अथवा जिस में केश वा कीड़े पड़े हों अथवा जिस को पतितों ने देखा हो उस अन्न को भक्षणकर द्विज एक दिन पञ्चगव्य पीवे ॥१९८॥ अंत्यजस्त्री के अथवा रजस्वला के पात्र में खाकर गोमूत्र और जौं को खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥१९९॥ गौका वा मनुष्य का मांस जो वा कुत्ते के मुख से आया हो वह अभक्ष्य है उसे खाकर चांद्रायण व्रत करे ॥ २०० ॥
संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३१
चांडालेसंकरेविप्रः श्वपाकेपुल्कसेपिवा । गोमूत्रयावकाहारो मासाद्धेर्नविशुद्ध्यति ॥२ १॥ पतितेनतुसंसर्गं मासमासार्द्धमेववा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥२०२॥ पतिताद्द्रव्यमादत्ते भुंक्ते वाब्राह्मणोयदि । कृत्वातस्यसमुत्सर्ग-मतिकृच्छ्रं चरेद्द्विजः ॥ २०३ ॥ यत्रयत्रचसंकीर्ण मात्मानंमन्यतेद्विजः । तत्रतत्रतिलैर्होमो गायत्र्याप्रत्यहंद्विजः ॥ २०४ ॥ एषएवमयाप्रोक्तः प्रायश्चित्तविधिःशुभः अनादिष्टेषुपापेषु प्रायश्चित्तंनचोच्यते ॥ २०५ ॥ दानैर्होमैर्जपैर्नित्यं प्राणायामैर्द्विजोत्तमः । पातकेभ्यःप्रमुच्येत वेदाभ्यासान्नसंशयः ॥२०६॥ सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंतथैवच । नाशयन्त्याशुपापानि ह्यन्यजन्मकृतान्यपि ॥२०७॥
चांडाल-वर्णसंकर-श्वपाक-और पुल्कस इन के भोजन को खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०१ ॥ एक मास अथवा पंद्रह दिन पतित का संसर्ग (मेल) करे तो गोमूत्र और जौं का खाकर पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २०२ ॥ जो ब्राह्मण पतित के द्रव्य को ग्रहण करता है अथवा खाता है वह उस अन्न का त्याग ( वमन ) करके अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ २०३ ॥ जिस २ कर्म में द्विज अपने को संकीर्ण (पतित) समझे उसी २ कर्म में गायत्री मन्त्र से तिलों का प्रतिदिन होम करे ॥२०४॥ यह हमने प्रायश्चित्त का श्रेष्ठ विधान कहा और जो पाप अनादिष्ट (शास्त्र में नहीं कहे) हैं उनका प्रायश्चित्त भी नहीं कहा है॥२०५॥ दान होम जप-प्राणायाम-और वेद पाठ-इनके करने से ब्राह्मण सदैव उन पाप से मुक्त होता है ॥२०६॥ सोना-गौ और पृथ्वी इनका दान अन्य जन्म के किये हुये पापों को भी शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ २०७॥
३२ पाराशर्यसंहिता ॥
तिलंधेनुंचयोदद्या-त्संयतायद्विजातये । ब्रह्महत्यादिभिःपापै-र्मुच्यतेनात्रसंशयः ॥ २०८ ॥ माघमासेतुसंप्राप्ते पौर्णमास्यामुपोषितः । ब्राह्मणेभ्यस्तिलान्दत्वा सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२०९॥ उपवासीनरोभूत्वा पौर्णमास्यांतुकार्तिके । हिरण्यंवस्त्रमन्नंच दत्वातरतिदुष्कृतम् ॥२१०॥ अयनेविषुवेचैव व्यतीपातेदिनक्षये । चन्द्रसूर्यग्रहेचैव दत्तंभवतिचाक्षयम् ॥ २११ ॥ अमावास्याचद्वादश्यां संक्रांतौचविशेषतः । एताःप्रशस्तास्तित्थयो भानुवारस्तथैवच ॥२१२॥ तत्रस्नानंजपोहोमो ब्राह्मणानांचभोजनम् । उपवासस्तथादान-मेकैकंपावयेन्नरम् ॥ २१३ ॥ स्नातःशुचिर्धौतवासाः शुद्धात्माविजितेन्द्रियः ।
जो जितेन्द्रिय ब्राह्मण को तिल तथा गौ को देता है वह ब्रह्महत्या आदि पापों से निर्मुक्त हो जाता है इस में संशय नहीं है ॥२०८॥ माघ महीने की पूर्णमासी को उपवास करके जो तिलों का दान ब्राह्मणों को देता है वह सब पापों से मुक्त होजाता है ॥ २०९ ॥ कार्तिक की पूर्णमासी को उपवास करके सोना-वस्त्र और अन्न इन का दान देकर पापसागर से तरजाता है॥२१०॥ दक्षिणायन, उत्तरायण-विषुव(तुल मेष)की संक्रान्ति, व्यतिपात योग-तिथि की हानि, चन्द्र और सूर्य के ग्रहण-में दिया हुआ दान अक्षय होता है ॥ २११ ॥ अमावस, द्वादशी, संक्रान्ति विशेष कर ये तिथौ और रविवार ये दान के लिये बहुत श्रेष्ठ हैं॥ २१२॥ इन में किये हुये स्नान, जप, होम और ब्राह्मणों को भोजन उपवास तथा दान प्रत्येक मनुष्य को पवित्र करते हैं ॥ २१३ ॥ स्नान करके तथा शुद्ध होकर धुले हुये श्वेत वस्त्र धारणकर शुद्ध मन हो इन्द्रियों को जीत कर और
६
संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३३
सात्त्विकंभावमास्थाय दानंदद्याद्विचक्षणः ॥२१४ ॥ सप्तव्याहृतिभिःकार्यो द्विजैर्होमो जितात्मभिः । उपपातकशुद्ध्यर्थं सहस्रंपरिसंख्यया ॥२१५॥ महापातकसंयुक्तो लक्षहोमंसदाद्विजः । मुच्यतेसर्वपापेभ्यो गायत्र्याचैवपावितः ॥ २१६ ॥ अभ्यसेत्सतथापुण्यां गायत्रींवेदमातरम् । गत्वाऽरण्येनदीतीरे सर्वपापविशुद्धये ॥ २१७ ॥ स्नात्वाचविधिवत्तत्र प्राणानायम्यवाग्यतः । प्राणायामैस्त्रिभिःपूतो गायत्रींतुजपेद्विजः ॥२१८॥ अक्लिन्नवासाःस्थलगः शुचौदेशे समाहितः । पवित्रपाणिराचान्तो गायत्र्याजपमारभेत् ॥२१९॥ ऐहिकामुष्मिकंपापं सर्वंनिरवशेषतः । पञ्चरात्रेणगायत्रीं जपमानोव्यपोहति ॥२२०॥ गायत्र्यास्तुपरंनास्ति शोधनंपापकर्मणाम् ।
सात्त्विकस्वभाव ( सुशील ) होकर ज्ञानवान् पुरुष दानदे ॥ २१४ ॥ मन को जीतने वाले द्विज लोग उपपातकों की शुद्धि के अर्थ सात व्याहृतियों से एक हजार आहुति होम करें ॥२१५ ॥ तथा महापातकी गायत्री से लक्ष ( लाख ) आहुति होम करे क्योंकि गायत्री से पवित्र किया ब्राह्मण सब पापों से मुक्त होजाता है ॥२१६॥ सर्वपापों की शुद्धि के लिये वेदों की माता पवित्र गायत्री का वन में जाकर वा नदी के तट पर जप करे । २१७॥ नदी तालाब आदि में विधिपूर्वक स्नान तथा आचमन करके तीन प्राणायामों से पवित्र हुआ द्विज गायत्री का जप करे ॥२१८॥ क्लिन्न (गीले) वस्त्र न पहनकर शुद्ध स्थान पर स्थल में बैठ के सावधान होकर कुशाओं की पवित्री धारण कर आचमन के पश्चात् गायत्री के जप का आरम्भ करे ॥२१९॥ पांच दिन तक गायत्री का जप करता हुआ, पुरुष इस जन्म और अन्य जन्म के संपूर्ण पापों को नष्ट करता है ॥२२०॥ पापियों को शुद्ध करने वाला गायत्री से परे अन्य उपाय नहीं है महाव्याहृति और
३४ भाषार्थसहिता ॥
महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेनचसंजपेत् ॥२२१॥ ब्रह्मचारीनिराहारः सर्वभूतहितेरतः । गायत्र्यालक्षजप्येन सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२२२॥ अयाज्ययाजनंकृत्वा भुक्त्वाचान्नंविगर्हितम् । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ॥२२३॥ अहन्यहनियोधीते गायत्रींवेदद्विजोत्तमः । मासेनमुच्यतेपापा-त्पन्नगःकंचुकाद्यथा ॥२२४॥ गायत्रींयस्तुविप्रोवै जपेन्नियतस्सदा । सयातिपरमंस्थानं वायुभूतःखमूर्तिमान् ॥२२५॥ प्रणवेनचसंयुक्ता व्याहृतीःसप्तनित्यशः । गायत्रींशिरसासाद्धं मनसात्रिःपठेद्द्विजः ॥२२६॥ निगृह्यचात्मनःप्राणा-न्प्राणायामोविधीयते । प्राणायामत्रयं कुर्या-न्नित्यमेवसमाहितः ॥२२७॥ मानसंवाचिकंपापं कायेनैवचयत्कृतम् ।
ोंकार सहित गायत्री का जप करे ॥ २२१ ॥ ब्रह्मचारी भोजन को छोड़ कर सब के कल्याण में तत्पर हुआ एक लाख गायत्री का जप कर ने से सब पापों से मुक्त होता है ॥ २२२ ॥ यज्ञ कराने के अयोग्य पुरुष के यहां यज्ञ कराकर और निन्दित अन्न को खाकर आठ हजार गायत्री का जप करने से शुद्ध होता है ॥ २२३ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन गायत्री का जप करता है वह पाप से इस प्रकार छूटता है जैसे कांचली से सांप ॥२२४॥ जो ब्राह्मण इन्द्रियों को वश में करके सदा गायत्री का जप करता है वह वायु और आकाश रूप होकर उत्तम स्थान को प्राप्त होता है ॥२२५॥ ओंकार सहित सातव्याहृति और (आपोज्योती०) इस शीर्ष मन्त्र सहित गायत्री अर्थात् प्राणायाम को द्विज तीन बार नित्य करे ॥२२६॥ प्राणों को वश में करने को प्राणायाम कहते हैं सावधान हो कर प्रतिदिन तीन प्राणायाम करे ॥२२७॥ मन वाणी देह से किया जो पाप
संवर्त्तस्मृतिः ॥ ३५
तत्सर्वंनाशमायाति प्राणायामप्रभावतः ॥२२८॥ ऋग्वेद मभ्यसेद्यस्तु यजुःशाखामथापिवा । सामानिसरहस्यानि सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥२२९॥ पावमानींतथाकौत्सीं पुरुषंसूक्तमेवच । जप्त्वापापैःप्रमुच्येत सपित्र्यंमाधुच्छंदसम् ॥२३०॥ मंडलंब्राह्मणंरुद्र सूक्तोक्तांश्चबृहत्कथाः । वामदेव्यंबृहत्साम जप्त्वापापैःप्रमुच्यते ॥ २३१ ॥ चांद्रायणंतुसर्वेषां पापानांपावनंपरम् । कृत्वाशुद्धिमवाप्नोति परमंस्थानमेवच ॥२३२॥ धर्मशास्त्रमिदंपुण्यं संवर्त्तेनतुभाषितम् । अधीत्यब्राह्मणोगच्छेद्व्रह्मणःसद्मशाश्वतम् ॥२३३॥ इति संवर्त्तप्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥
वह सब प्राणायाम के प्रभाव से नष्ट हो जाता है ॥ २२८ ॥ ऋग्वेद यजुर्वेद की शाखा और उपनिषद् भाग सहित सामवेद इन का अभ्यास (पाठ) करके मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है ॥ २२९ ॥ ऋग्वेद के नवम मण्डल के आरम्भ के पवमान सूक्त हैं उन पावमानी, कुत्सऋषि वाले (अपनः शोशुचदघ०) इत्यादि । ऋ० १।९।५ सूक्त (सहस्र शीर्षा०) इत्यादि पुरुष सूक्त पितृ देवता तथा मधुछन्दो ऋषि वाले मंत्र इनको जप कर सब पापों से छूटता है ॥ २३० ॥ मण्डल ब्राह्मण ( शतपथ कां० १०। अ ५। ब्रा०२ रुद्र सूक्त के विस्तृत कथन, वामदेव्य साम और बृहत्साम वेद इनको जप के भी पापों से छूटता है ॥ २३१ ॥ परन्तु सब प्रायश्चित्तों में चान्द्रायण व्रत परम उत्तम है उसको करके शुद्ध हुआ उत्तम लोक को प्राप्त होता है ॥ २३२ ॥ संवर्त्त ऋषि के कहे इस पवित्र धर्म शास्त्र को ब्राह्मण पढ़ और जान तदनुसार चलकर सनातन ब्रह्मलोक में जाता है ॥ २३३ ॥
इति संवर्त प्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥ ८ ॥
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