अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ भाषार्थसहिता ॥
ऋतुकालाभिगामीच प्राप्नोतिपरमांगतिम् । उषित्वाैवंगृहेविप्रो द्वितीयादाश्रमात्परः ॥ १०१ ॥ वलीपलितसंयुक्त—स्तृतीयंतुसमाश्रयेत् । वनंगच्छेत्ततःप्राज्ञः सभार्यस्त्वेकएववा ॥ १०२ ॥ गृहीत्वाचाग्निहोत्रंच होमंतत्रनहापयेत् । कृत्वाचैवपुरोडाशं वन्यैर्मेध्यैर्यथाविधि ॥ १०३ ॥ भिक्षांचभिक्षवेद्या—च्छाकमूलफलादिभिः । कुर्यादध्ययनंनित्य—मग्निहोत्रपरायणः ॥ १०४ ॥ इष्टिंपावर्वायणीयांतु प्रकुर्यात्प्रतिपर्वसु । उषित्वाैवंवनेविप्रो विधिज्ञःसर्वकर्मसु ॥ १०५ ॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छे-ज्जितक्रोधोजितेन्द्रियः । अग्निमात्मनिसंस्थाप्य द्विजःप्रव्रजितोभवेत् ॥१०६॥ वेदाभ्यासरतो नित्य-मात्मविद्यापरायणः ।
और ऋतुकाल में स्त्री संग करता परमगति को प्राप्त होता है।इसप्रकार दूसरे आश्रम में तत्पर ब्राह्मण घर में रहकर ॥१०१॥ वली और पलित (श्वेत केश) से युक्त होता हुआ तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ) का आश्रय ले पुनः एकाकी अथवा स्त्री सहित वन में चला जाय ॥ १०२ ॥ पुनः वन में अग्निहोत्र को ग्रहण करके होम को न त्यागे तथा वन के कंद मूलों से पुरोडाश को विधि से बनाकर ॥१०३॥ शाक मूल फलादिक की भिक्षु को भिक्षा दे-और अग्निहोत्र में तत्पर हो कर नित्य वेदका अध्ययन करे ॥१०४॥ सब पर्वों में पर्व (अमावास्या आदि) में करने योग्य इष्टिकरे संपूर्ण कर्मों की विधि जानने वाला ब्राह्मण इसप्रकार वन में स्थितहोकर ॥१०५॥क्रोध और इन्द्रियों को जीत कर चौथे आश्रम (संन्यास) को से और आत्मा में अग्नि को रखकर संन्यासी हो जाय ॥ १०६॥ वेद के अभ्यास में तथा आ-