भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ १५

नित्येनैमित्तिकेकाम्ये तिलान्दत्त्वास्वशक्तितः ॥९३॥ प्रजावान्पशुमांश्चैव धनवान्जायतेनरः । योयदाम्यर्थितोविप्रै-र्यद्यत्संप्रतिपादयेत् ॥ ९४ ॥ तृणकाष्ठादिकंचैव गोप्रदानसमंभवेत् । नैवैशयीततमसा नयज्ञेनानृतंवदेत् ॥ ९५ ॥ अपवदेन्नविप्रस्य नदानंपरिकीर्तयेत् । यज्ञोऽनृतेनक्षरति तपःक्षरतिविस्मयात् ॥ ९६ ॥ आयुर्विप्रापवादेन दानंचपरिकीर्तनात् । चत्वार्येतानिकर्माणि संध्यायांवर्जयेद्बुधः ॥ ९७॥ आहारंमैथुनंनिद्रां तथासंपाठमेवच । आहाराज्जायतेव्याधि-र्गर्भोवै रौद्रमैथुनात् ॥ ९८ ॥ निद्रातोजायतेऽलक्ष्मी संपाठादायुषःक्षयः । ऋतुमतींतुयोभार्यां संनिधौनोपगच्छति ॥ ९९ ॥ तस्यारजसितन्मासं पितरस्तस्यशेरते । कृत्वागृह्याणिकर्माणि स्वभार्यापोषणेरतः ॥ १०० ॥


नैमित्तिक और काम्य कर्म में शक्ति के अनुसार तिलों को देकर ॥ ९३ ॥ मनुष्य प्रजा-पशु और धनवाला होता है-जो पुरुष ब्राह्मणों के मांगने से जिस समय जो २ देदे ॥९४॥ तृण वा काठ आदि वह सब गोदान के तुल्य है। अंधकार में न सोवे और यज्ञ में झूठ न बोले ॥९५॥ ब्राह्मण की निंदा न करे और न अपने दिये को प्रसिद्धकरे झूठ से यज्ञ और अभिमान से तप नष्ट होते हैं ॥९६॥ ब्राह्मण की निन्दा से अवस्था और कथन से दान नष्ट होते हैं-चार कर्मों को ज्ञानवान् संध्यासमय न करे ॥९७॥ भोजन-मैथुन-सोना और पढ़ना भोजन से व्याधि मैथुन से रौद्र [भयंकर गर्भ] ॥९८॥ सोने से दरिद्रता और पढ़ने से अवस्था का नाश होता है । जो ऋतुमती स्त्री के समीप नहीं जाता ॥ ९९ ॥ उस मनुष्य के पितर उस महीने में उस स्त्री के रज में सोते हैं । जो मनुष्य गृहस्थ के कर्म करके अपनी स्त्री के पोषण में तत्पर हैं ॥ १०० ॥