अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ भाषार्थसहिता ॥
यःप्रयच्छतिरोगिभ्यः सम्भवेद्दुर्व्याधिवर्जितः । गुडमिक्षुरसंचैव लवणंव्यंजनानिच ॥ ८७ ॥
सुरभीणिचपानानि दत्वात्यंतंसुखीभवेत् । दानैश्चविविधैःसम्यक् फलमेतदुदाहृतम् ॥ ८८ ॥
विद्यादानेनसुमति-र्ब्रह्मलोकेमहीयते । अन्योन्यान्नप्रदाविप्रा अन्योन्यप्रतिपूजकाः ॥ ८९ ॥
अन्योन्यंप्रतिगृह्णन्ति तारयंतितरंतिच । दानान्येतानिदेयानि तथान्यानिविशेषतः ॥ ९० ॥
दानाद्धंकृपणार्थिभ्यः श्रेयस्कामेनधीमता । ब्रह्मचारियतिभ्यस्तु वपनंयस्तुकारयेत् ॥ ९१ ॥
नखकर्मादिकंचैव चक्षुष्मान्जायतेनरः । देवागारेद्विजातीनां दीपंदद्याच्चतुष्पथे ॥ ९२ ॥
मेधावीज्ञानसंपन्न-श्चक्षुष्मान्ससदाभवेत् ।
ये वस्तु रोगियों को देता है वह व्याधिसे रहित होता है। गुड़ गन्नेका रस लवण व्यंजन दही आदि ॥८७॥ और सुगंध युक्त पीनेके वस्तु इन को देकर अत्यंत सुखी रहता है। यह नाना प्रकार के दानोंका फल कहा है ८८॥ विद्याके दानसे अच्छी बुद्धि वाला पुरुष ब्रह्मलोक में पूजा को प्राप्त होता है। परस्पर अन्न के दाता और परस्पर सत्कार करने वाले ॥८९॥ तथा परस्पर दान लेने वाले ब्राह्मण अन्य को पार करते और आप भी पार होते हैं। ये [पूर्वोक्त] दान और अन्य भी दान विशेष कर ॥ ९० ॥ दीन अभ्यागतों को कल्याण का अभिलाषी पुरुष दानाई [शास्त्रोक्त में आधा] दे-ब्रह्मचारी और संन्यासी का जो मुंडन करवाता है ॥९१॥ अथवा नख कटवाता है वह मनुष्य नेत्रों वाला होता है देवता और ब्राह्मणों के मंदिर में तथा चतुष्पथ [ चौराहा ] में जो दीपक देता है ॥ ९२ ॥ वह सदा बुद्धिमान् तथा ज्ञानी और नेत्रों वाला होता है नित्य