भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ १५

अन्नदस्त्वभवेन्नित्यं सुतृप्तोनिभृतःसदा । अंबुदश्चसुखीनित्यं सर्वकर्मसमन्वितः ॥ ८० ॥

सर्वेषामेवदानाना-मन्नदानंपरंस्मृतम् । सर्वेषामेवजंतूनां यतस्तज्जीवितंपरम् ॥ ८१ ॥

यस्मादन्नात्प्रजाःसर्वाः कल्पेकल्पेसृजत्प्रभुः । तस्मादन्नात्परंदानं विद्यतेनहिकिंचन ॥ ८२ ॥

अन्नाद्भूतानिजायन्ते जीवन्तिचनसंशयः । मृत्तिकागोशकृद्भर्मा-नुपवीतंतथोत्तरम् ॥ ८३ ॥

दत्त्वागुणाढ्यविप्राय कुलेमहतिजायते । मुखवासन्तुयोदद्या-द्दन्तधावनमेवच ॥ ८४ ॥

शुचिगन्धसमायुक्तो अवाग्दुष्टस्सदाभवेत् । पादशौचंतुयोदद्या-त्तथाचगुदलिंगयोः ॥ ८५ ॥

यःप्रयच्छातविप्राय शुद्धबुद्धिःसदाभवेत् । औषधंपथ्यमाहारं स्नेहाभ्यंगंप्रतिश्रयम् ॥ ८६ ॥


अन्नका दाता नित्य तृप्ततथा पुष्टरहता है और जल का दाता सुखी तथा सब कर्मों से युक्त रहता है ॥८०॥ सब दानों में अन्न का दान उत्तम कहा है क्यों कि सब प्राणियों का अन्न ही जीवन है ॥ ८१ ॥ जिस अन्न से ही ब्रह्मा ने कल्प २ में संपूर्ण प्रजा रची इस लिये अन्नसे उत्तम और कोई दान नहीं है ॥८२॥ अन्न से प्राणी पैदा होते हैं तथा अन्न से ही जीते हैं इसमें संशय नहीं मिट्टी गोबर कुशा और उत्तम यज्ञोपवीत ॥ ८३ ॥ इनको अनेक गुण वाले ब्राह्मण को देकर बड़े कुल में उत्पन्न होता है । जो मनुष्य ब्राह्मण को मुख वास ( पान वा सुपारी वा इलायची ) अथवा दातौन देता है ॥ ८४ ॥ वही गंधवाला होता है और कभी भी वाग्दुष्ट (तोतला वा गूंगा ) नहीं होता जो पुरुष पैर गुदा लिंग इनके शौच के लिये जल ॥८५॥ ब्राह्मण को देता है वह सदा शुद्ध बुद्धि होता है । जो औषध-पथ्य भोजन तेल का उबटना और रहने को स्थान ॥ ८६ ॥