भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१२ भाषार्थसंहिता ॥

गांदत्त्वा दुष्प्रसूतांच स्वर्गलोके महीयते ॥ ७३ ॥
यावन्ति सस्यमूलानि गोरोमाणि च सर्वशः ।
नरस्तावन्ति वर्षाणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ७४॥
यो ददाति शफै रौप्यैर्हेमशृङ्गीमरोगिणीम् ।
सवत्सां वाससा वीतां सुशीलां गां पयस्विनीम् ॥७५ ॥
तस्यां यावन्ति रोमाणि सवत्सायां दिवंगतः ।
तावन्ति वत्सरांस्तानि सनरीब्रह्मणोंतिके ॥ ७६ ॥
यो ददाति बलीवर्दं मुक्तेन विधिना शुभम् ।
अष्टयंगं गोप्रदानेन दत्तंदशगुणं फलम् ॥ ७७ ॥
अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः ।
लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ताः, यः कांचनं गां च महीं च दद्यात् ॥७८॥
सर्वेषामेव दानाना-मेकजन्मानुगं फलम् ।
हाटकक्षितिगौरीणां सप्तजन्मानुगं फलम् ॥ ७९ ॥


ल्यानी गो इन्हें वेदज्ञ ब्राह्मणको देकर स्वर्गलोकमें पूजाको प्राप्त होता है॥७३॥ जितनी अन्न के पौधों की जड़ हैं और जितने गो के रोम हैं उतने वर्ष पर्यन्त वह मनुष्य स्वर्ग में पूजित होता है ॥७४॥ चांदी के खुरों वाली सोने के सींग वाली हो जिस के बछड़ा अथवा बछिया हो, जिसे कोई रोग न हो जो वस्त्र से ढकी हो तथा जो सुशीला हो और दूध देती हो ऐसी गौ को जो देता है ॥ ७५ ॥ उस गौ और बछड़े के जितने रोम हैं उतने ही वर्षों के अन्त तक वह मनुष्य ब्रह्मा के समीप ब्रह्मलोक में रहता है ॥७६॥ पूर्वोक्त विधि से जो सावधान मनुष्य बैलको देता है वह गौ के दान से दश गुणे फल को प्राप्त होता है ॥७७॥ सुवर्ण प्रथम पुत्र अग्नि का है पृथ्वी वैष्णवी (विष्णु की पुत्री) है गौ सूर्य की पुत्री हैं इन से जो मनुष्य सोना गौ-पृथ्वी इन को देता है वह त्रिलोकी को ही मानो देता है ॥ ७८ ॥ सम्पूर्ण दानों का फल अगले एक ही जन्म में मिलता और सुवर्ण पृथ्वी गौ इन का फल सात जन्म तक मिलता है ॥ ७९ ॥