भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 805 में से

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कात्यायनस्मृतिः ॥ ५९

रक्षेद्द्वारिणात्मानं परिक्षिप्यसमंततः । शिरसोमार्जनंकुर्यात्कुशैः सोदकविन्दुभिः ॥ ४ ॥ प्रणवोभूर्भुवःस्वश्च सावित्रीचतृतीयिका । अब्दैवतंस्यृचश्चैव चतुर्थमितिमार्जनम् ॥ ५ ॥ भूराद्यास्तिस्रएवैता महाव्याहृतयोऽव्ययाः । महर्जनस्तपःसत्यं गायत्रीचशिरस्तथा ॥ ६ ॥ आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरितिशिरः । प्रतिप्रतीकं प्रणवमुच्चारयेदन्तेचशिरसः ॥ ७ ॥ एताएतांसहानेनतथैभिर्दशभिःसह । त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥ ८ ॥ करेणोद्धृत्यसलिलंघ्राणमासज्यतत्रच । जपेदनायतासुर्वात्रिःसकृद्वाघमर्षणम् ॥ ९ ॥ उत्थाय कर्मातिप्राहेसवित्रेकेणाऽञ्जलिनाम्भसः ।


अपने शरीर के चारों ओर जल भ्रमा के अपनी रक्षा करे और जल को लेकर कुशाओं से शिर का मार्जन करे । प्र० ओंकार भूः, भुवः, स्वः, और तीसरी गायत्री, जल है देवता जिन का ऐसी तीन ऋचा ( आपो हिष्ठा० आदि ) यह चौथा मार्जन है ॥ ५ ॥ भूः भुवः स्वः ये तीन नित्य अविनाशी महाव्याहृती हैं महःजनः तपः सत्य और गायत्री और शिरः ॥ ६ ॥ (आपोज्योती रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वः) यह शिर मंत्र है। भूः आदि प्रत्येक के साथ और शिरः मंत्र के पीछे ओंकार का उच्चारण करे ॥ ७ ॥ ये सात व्याहृति गायत्री यह शिरोमंत्र और ओंकार इन दशों का प्राणों को रोक कर तीन बार जो जप करना है उसे प्राणायाम कहते हैं ॥ ८ ॥ हाथ में जल को उठा के और नासिका में लगाकर तीन बार वा एकबार प्राणों को रोके हुए वा न रोके हुए अघमर्षण (ऋतंच सत्यंचा०) इत्यादि मंत्र को जपै ॥ ९ ॥ उठकर जल की अंजलि से सूर्य के सम्मुख हो अर्थात् गायत्री मन्त्र पढ़ के अंजली देवे फिर ( उदुत्यं

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