अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ पाराशर्य्यसंहिता ॥
उद्यच्चित्रम्ऋग्द्वयेनाथचोपतिष्ठेदनन्तरम् ॥ १० ॥ संध्याद्वयेऽप्युपस्थानमेतदाहुर्मनीषिणः । मध्येत्वन्ह उपस्थायविभ्राडादीच्छयाजपेत् ॥ ११ ॥ तदसंसक्तपाष्णिर्वाएकपाददृढंपादपि । कुर्यात्कृताञ्जलिर्वापि ऊर्ध्वबाहुरथापिवा ॥ १२ ॥ यत्रस्यात्कृच्छ्रभूयस्त्वं श्रेयसोऽपिमनीषिणः । भूयस्त्वंब्रुवतेतस्यकृच्छ्रेणोहावाप्यते ॥ १३ ॥ तिष्ठेदुदयनात्पूर्वामध्यनामपिशक्तितः । आसीनस्तुसमाप्तान्त्यां संध्यांपूर्वेत्रिकंजपन् ॥ १४ ॥ एतत्संध्यात्रयंप्रोक्तं ब्राह्मण्यंयत्प्रतिष्ठितम् । यस्यनास्त्यादरस्तत्र नसब्राह्मणउच्यते ॥ १५ ॥ सन्ध्यालोपाच्चचकितः स्नानशीलश्चयःसदा ।
ज्ञान० । चित्रंदेवानां ) इत्यादि दो ऋचाओं से सूर्य की स्तुति करे ॥ १० ॥ दोनों संध्याओं में यही सूर्य का उपस्थान है ऐसा मुनीश्वर लोग कहते हैं और मध्यान्ह में स्तुति के पीछे अपनी इच्छा हो तो (विभ्राड्) इस अनुवाकादि को जपे ॥ ११ ॥ उस स्तुति के समय ऐड़ी पृथ्वी पर न लगे अथवा एक ही पैर से खड़ा रहे अथवा आधे पैर से फिर हाथ जोड़ कर अथवा ऊपर को भुजा करके सूर्य की स्तुति करे ॥ १२ ॥ एक पग से खड़े होने आदि जिस प्रकार करने में कष्ट बहुत हो उसी में कल्याण भी बहुत होता है यह बुद्धिमान् कहते हैं क्योंकि कष्ट से ही कल्याण प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ उदय से पूर्व प्रातःकाल और मध्याह्न की संध्या में यथाशक्ति यथावकाश पूर्वाभिमुख खड़े होके गायत्री जपे और सायंकाल में सूर्यास्त होने से पूर्व बैठ कर गायत्री जपे ॥ १४ ॥ ये जो तीन संध्या कही हैं उन्हीं में ब्राह्मण्य (ब्राह्मणपन) ठहरता है जिस को इन तीनों में आदर श्रद्धा नहीं वह ब्राह्मण भी नहीं है ॥ १५ ॥ जो सन्ध्या के न करने में पाप से भयभीत है और स्नान करने