भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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कात्यायनस्मृतिः ॥ २३

माषकोद्रवगौरादिसर्वालाभेऽपिवर्जयेत् ॥ १० ॥
पाण्याहुतिर्द्वादशपर्व्वपूरिका
कंसादिनाचेत्स्रुवमात्रपूरिका ।
दैवेनतीर्थेनचहूयतेहविः
स्वंगारिणिस्वर्चिषितच्चपावके ॥ ११ ॥

योऽनार्च्चिषिजुहोत्यग्नौ व्यंगारिणिचमानवः ।
मन्दाग्निररामयावी च दरिद्रश्चसजायते ॥ १२ ॥
तस्मात्समिद्धेहोतव्यं नासमिद्धेकदाचन ।
आरोग्यमिच्छतायुश्च श्रियमात्यंतिकींपराम् ॥१३॥
होतव्येचहुतेचैव पाणिशूर्पस्फ्यदारुभिः ।
नकुर्यादग्निधमनं कुर्याद्भाव्यजनादिना ॥ १४ ॥
मुखेनैकेधमन्त्यग्निंमुखाद्ध्ये षोऽध्यजायत ।


इन को सदा ही वर्ज दे और तिल आदि की आहुति दे देवे ॥१०॥ सूखे चांवल तिलादि से होम करने में हाथ से जो आहुति देनी हो तो इतने की देवे जिस से बारह पर्व्व ( अंगुल ) चारों अंगुलियों के भर जायं यदि पात्र से देतो स्रुवे को भरके दे और साकल्य को देवतीर्थ [ अंगुलियों के अग्रभाग में होता है ] से अंगारों वाले अच्छे प्रज्वलित अग्नि में आहुति देवे ॥ ११ ॥ जिस में ज्वाला और अंगार नहीं ऐसे अग्नि में जो मनुष्य होम करता है वह मंदाग्नि वाला रोगी और दरिद्री होता है ॥ १२ ॥ तिस से नीरोगता बड़ी अवस्था-और अत्यन्त श्रेष्ठ लक्ष्मी की इच्छा करने वाला पुरुष अच्छे जलते हुए अग्नि में होम करे-जो अग्नि न जलता हो उस में कभी नकरै ॥ १३ ॥ जिस अग्नि में होम करना हो या कर चुका हो उस को हाथ-सूप-स्फ्य [ खङ्ग के तुल्य बना ] तथा लकड़ी से न धोंके किन्तु वीजने आदि से ही जलावे ॥ १४ ॥ कोई आचार्य मुख से अग्नि को जलाना कहते हैं क्योंकि यह अग्नि मुख से ही पैदा हुआ है यदि कोई यह कहे कि अग्नि