अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ भाषार्थसहिता ॥
संध्यामुद्दिश्यजुहुयाहु तमप्यनलुप्यते ॥ ४ ॥ नकुर्यात्क्षिप्तहोमेषु द्विजःपरिसमूहनम् । वैरूपाक्षंचनजपेत्प्रपदं चविवर्जयेत् ॥ ५ ॥ पर्युक्षणंचसर्वत्रकर्त्तव्यमुदितेन्विति । अंतेचवामदेव्यस्य गानंकुर्याहिचस्त्रिधा ॥ ६ ॥ अहोमकेष्वपिभवेद्यथोक्तं चंद्रदर्शनम् । वामदेव्यंगणेष्वन्ते वल्यन्तेवैश्वदेविके ॥ ७ ॥ यान्यधस्तरणान्तानि नतेपुस्तरणंभवेत् । एककार्यार्थसाध्यत्वात्परिधीनपिवर्जयेत् ॥ ८ ॥ बर्हिःपर्युक्षणंचैव वामदेव्यजपस्तथा । क्रत्वाहूतिषुसर्वासु त्रिकमेतन्नविद्यते ॥ ९ ॥ हविष्येषुयथा मुख्यास्तदनुव्रीहयः स्मृतः ।
झाड़ में होनेसेसूर्य न दीखेंतो सन्ध्या समय समझ कर जो होम करै उसका होम नष्ट नहीं होता ॥४॥ द्विज पुरुष शीघ्रता के होमों में परिसमूहन न करै-और विरूपाक्ष मंत्र न जपे प्रपद नामक कर्म भी छोड़ देवे ॥ ५ ॥ सब होमों की आदि में पर्युक्षण (ईशान कोण से प्रदक्षिण अग्नि कुंड के सब ओर जल सेचन करना) और अंत में वामदेव्य साम का तीन प्रकार से गान करे ॥६॥ जिन कर्मों में होम नहीं होता उन में चन्द्रमा का दर्शन जैसे होता है ऐसे सब गणों (कर्मों के समूहों) के अंत में और बलिदान के अन्त में वैश्वदेव के अंत में वामदेव्य साम का गान करना चाहिये ॥ ७ ॥ नीचे स्थल में बिछाये कुशों तक जिन कर्मों की समाप्ति होती है उन में अलग २ कुश नहीं बिछाने चाहिये और एक ही कार्य की सिद्धि के लिये होने से पृथक् २ बने अग्निकुण्डों में अलग २ परिधि नामक लकड़ी भी स्थापित न करे ॥ ८ ॥ बर्हिः [ चार मुट्ठी कुशों के बिछाने का विनियोग ] पर्युक्षण वामदेव्य साम का गान ये तीन कर्म यज्ञों की आहुतियों में नहीं होते ॥ ९ ॥ सब हविष्योँ में जो मुख्य धान वा जौ हैं वे न मिलें तो अन्य कोई अन्न ले लेवे परन्तु उड़द-कोदों-गेहूं