भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१८ | पाराशरस्मृतिः ॥

दन्तजातेनुजातेच कृतचूड़ेचसंस्थिते ।
अग्निसंस्करणंतेषां त्रिरात्रंसूतकंभवेत् ॥ २४ ॥
आदन्ताजननात्सद्यआचूडान्नैशिकीस्मृता ।
त्रिरात्रमाव्रतात्तेषांदशरात्रमतःपरम् ॥ २५ ॥
गर्भयदिविपत्तिःस्याद्दशाहंसूतकंभवेत् ।
जीवन्जातोयदिप्रेतः सद्यएवविशुध्यति ॥ २६ ॥
स्त्रीणांचूडान्नआदानात्सप्तमात्तदधःक्रमात् ।
सद्यःशौचमथैकाहं त्र्यहःपितृवन्धुषु ॥ २७ ॥
ब्रह्मचारीगृहेयेषां हूयतेचहुताशनः ।
संपर्कंचेन्नकुर्वन्ति नतेषांसूतकंभवेत् ॥ २८ ॥
संपर्काद्दुष्यतेविप्रो जननेमरणेतथा ।
संपर्काच्चनिवृत्तस्य नप्रेतंनैवसूतकम् ॥ २९ ॥


दांत उगने के पीछे या दांत निकलने ही अथवा मुण्डन हो जाने पर बालक मर जाय तो उसका अग्नि से दाह करे और तीन दिन रात अशुद्धि माने ॥२४॥

दांतों के निकलने से पहिले जो बालक मरे तो उसी समय, चूड़ाकर्म से पहिले मरे तो एक दिन रात और यज्ञोपवीत से पहिले मरे तो तीन दिन रात का अशौच होता है इससे परे दश दिन का होता है ॥ २५ ॥

यदि गर्भ में विपत्ति हो जाय अर्थात् जीवित बच्चा पैदा हो कर मर जाय तो दश दिन और मरा हुआ पैदा हो तो तत्काल शुद्धि होती ॥ २६ ॥

चूड़ा कर्म से पहिले कन्या मरे तो तत्काल शुद्धि होती, सगाई से पहिले मरे तो एक दिन रात और वाग्दान होने पर सप्तपदी से पहिले मरे तो पितृगोत्र वालों को तीन दिन रात शुद्धि माननी चाहिये ॥ २७ ॥

जिन के घर में होम करता हुआ ब्रह्मचारी रहता हो और वह यदि मर जाय तो जिन लोगों ने उसका स्पर्श नहीं किया उन्हें सूतक नहीं लगता ॥ २८ ॥

जन्म और मरण सम्बन्धी सूतक में सात पीढ़ी वालों से भिन्न ब्राह्मण स्पर्श करने से दूषित होता यदि संपर्क न करै तो दोनों ही सूतक नहीं लगते ॥ २९ ॥