भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 350

भाषाधर्मसंहिता ॥ १९

शिल्पिनःकारुकावैद्या दासीदासाश्चनापिताः । राजानःश्रोत्रियाश्चैव सद्यःशौचाःप्रकीर्तिताः ॥ ३० ॥ सत्रतीमन्त्रपूतश्च आहिताग्निश्चयोद्विजः । राज्ञश्चसूतकंनास्ति यस्यचेच्छतिपार्थिवः ॥ ३१ ॥ उद्यतोनिधनेदानेआर्तोविप्रोनिमन्त्रितः । तदैवऋषिभिर्दृष्टं यथाकालेनशुद्ध्यति ॥ ३२ ॥ प्रसवेगृहमेधीतु नकुर्यात्सङ्करंयदि । दशाहाच्छुद्ध्यतेमाता त्ववगाह्यपिताशुचिः ॥ ३३ ॥ सर्वेषांशावमाशौचं मातापित्रोस्तुसूतकम् । सूतकंमातुरेवस्या दुपस्पृश्यपिताशुचिः ॥ ३४ ॥ यदिपत्न्य्यांप्रसूतायां संपर्कंकुरुतेद्विजः । सूतकंतुभवेत्तस्य यदि विप्रःषडङ्गवित् ॥ ३५ ॥ संपर्काज्जायतेदोषो नान्यादोषोस्तिवैद्विजे ।


शिल्पी (चित्र बनाने वाले) कारीगर, वैद्य, दासी (टहलनी) दास, नाई, राजा, और, वेदपाठी, इनकी उसी समय तत्काल शुद्धि होती है ॥ ३० ॥ जिस ने किसी नियत काल तक व्रत ले रक्खा हो, वेदमन्त्रों के जप से जो पवित्र हैं, जो द्विज विधिपूर्वक अग्नि स्थापन करके अग्निहोत्री है, राजा को और जिस के सूतक को राजा न चाहे उस को सूतक नहीं लगता है ॥ ३१ ॥ दान में उद्यत (तईयार) मनुष्य यदि मरजाय और आर्त्त (दुःखी) ब्राह्मण को दान देने का न्योता दे रक्खा हो तो उसी दान के समय पर शुद्ध होता है यह ऋषियों ने जाना अर्थात् कहा है ॥ ३२ ॥ यदि जन्मसूतक में ब्राह्मण सूतिका का सङ्कर (स्पर्श) न करै तो माता दश दिन में और पिता स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ३३ ॥ शाव (मुर्दे का) आशौच सात पीढी तक सब को और जन्मसूतक माता पिता को ही लगता है और उन दोनों में भी माता ही विशेष कर अशुद्ध होती है पिता तो स्नान करने से ही शुद्ध हो जाता है ॥ ३४ ॥ जिस ब्राह्मण की स्त्री प्रसूता हो और वह पत्नी का स्पर्श करे तो चाहे वह वेद के छः अंग का पण्डित भी हो तो भी उसे सूतक लगता है ॥ ३५ ॥ ब्राह्मण को संपर्क