भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२० पाराशरस्मृतिः ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संपर्कंवर्जयेद्बुधः ॥ ३६ ॥ विवाहोत्सवयज्ञेषु त्वन्तरामृतसूतके । पूर्वसंकल्पितंद्रव्यं दीयमानंनदुष्यति ॥ ३७ ॥ अन्तरातुदशाहस्य पुनर्मरणजन्मनी । तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्देशम् ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणार्थेविपन्नानां वन्दिगोग्रहणेतथा । आहवेषुविपन्नानामेकरात्रमशौचकम् ॥ ३६ ॥ द्वाविमौपुरुषौलोके सूर्यमण्डलभेदिनी । परिव्राड्योगयुक्तश्च रणेचाभिमुखोहतः ॥ ४० ॥ यत्रयत्रहतःशूरः शत्रुभिःपरिवेष्टितः । अक्षयांल्लभतेलोकान् यदिप्लीवंनभाषते ॥ ४१ ॥ संन्यस्तंब्राह्मणंदृष्ट्वा स्थानाच्चलतिभास्करः । एषमेमण्डलंभित्त्वा परंस्थानंप्रयास्यति ॥ ४२ ॥


से दोष लगताहै अन्य कुछ दोष नहीं है तिससे बड़े यत्न से ज्ञानवान् द्विजसंपर्क न करे ॥ ३६ ॥ विवाह, उत्सव, यज्ञ, इन के बीच यदि मरण वा जन्म हो जाय तो पूर्व संकल्पित किये द्रव्य के देने का दोष नहीं है ॥ ३७ ॥ यदि सूतक के दश आदि दिन पूरे होने से पहिले दूसरा मरण वा जन्म हो जाय तो ब्राह्मण तभी तक अशुद्ध होता है कि जब तक पहिले दश दिन पूरे हों ॥ ३८ ॥ ब्राह्मण के लिये, भागे ( कैदी ) के तथा गौ के पकड़ने में और संग्राम में जो मरे हैं उनको अशौच एक दिन रात का लगता है ॥ ३९ ॥ दो पुरुष जगत् में सूर्य मण्डल के भेदन करने वाले हैं एक तो योग युक्त योगाभ्यासी संन्यासी और दूसरा जो संग्राम में सन्मुख मरा हो ॥ ४० ॥ शत्रुओं से युद्ध में घेरा हुआ शूरवीर पुरुष जहां २ मारा जाता है वह अक्षय लोकों को प्राप्त होता है यदि वह क्लीव ( कातर के वचन न कहे ) ॥ ४१ ॥ संन्यासी ब्राह्मण को देखकर सूर्य नारायण भी अपने स्थान से चलायमान हो जाते हैं क्योंकि सूर्यनारायण को भय हो जाता है कि यह संन्यासी मेरे मण्डल को लांघकर परम स्थान ( ब्रह्मलोक ) को जायगा ॥ ४२ ॥