भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाथंसहिता ॥ २१

यस्तुभग्नेषुसैन्येषु विद्रवत्सुसमन्ततः । परित्रातायदागच्छेत्सचक्रतुफलंलभेत् ॥ ४३ ॥ यस्यच्छेदक्षतंगात्रं शरमुद्गरयष्टिभिः । देवकन्यास्तुतंवीरं हरन्तिरमयन्तिच ॥ ४४ ॥ देवाङ्गनासहस्राणि शूरमायोधनेहतम् । त्वरमाणाःप्रधावन्ति ममभर्ताममेतिच ॥ ४५ ॥ यंयज्ञसंघैस्तपसाचविप्राः स्वर्गेषिणोवाद्ययथैवयान्ति । क्षणेनयान्त्येवहितत्रवीराः प्राणान्सुयुद्धेनपरित्यजन्तः॥४६॥ जितेनलभ्यतेलक्ष्मीर्मृतेनापिवराङ्गनाः । क्षणध्वंसिनिकायेस्मिन्काचिन्तामरणेरणे ॥ ४७ ॥ ललाटदेशाद्रुधिरंस्रवच्च यस्याहवेतुप्रविशेतवक्त्रम् । तत्सोमपानेनकिलास्यतुल्यं संग्रामयज्ञेविधिवच्चदृष्टम्॥४८॥ अनाथंब्राह्मणंप्रेतं येवहन्तिद्विजातयः । पदेपदेयज्ञफलमानुपूर्व्याल्लभन्तिते ॥ ४९ ॥ नतेषामशुभंकिञ्चिद् द्विजानांशुभकर्मणि ।


जो शत्रुओं ने मारी पीटी और चारों तरफ भागती हुई सेना के मनुष्यों की रक्षा के लिये जाता है वह यज्ञ के फल को पाता है ॥४३॥ जिसका शरीर बाण मुद्गर-लाठी इनके छिद्रों से घायल हुआ है उस मनुष्य को देवताओं की कन्या बुला ले जातीं और रमण कराती हैं ॥ ४४ ॥ संग्राम में मारे गये शूर-बीर के सम्मुख हजारों देवताओं की कन्या शीघ्रता करतीं हुईं दौड़ती हैं कि यह मेरा भर्ता यह मेरा भर्त्ता हो ॥ ४५ ॥ यज्ञों के समूह और तप करके स्वर्ग की इच्छा करने वाले ब्राह्मण जिस लोक में जिस प्रकार जाते हैं उसी लोक में क्षणमात्र में ही वे शूरवीर जाते हैं जो युद्ध में प्राणों को त्यागते हैं ॥ ४६ ॥ जब युद्ध में जय होने से लक्ष्मी और मरने से अप्सरा मिलती हैं तो क्षणमात्र में नष्ट होने वाली काया के रण में मरने की क्या चिन्ता है ॥ ४७ ॥ संग्राम में मस्तक से गिरता रुधिर जिस के मुख में प्रवेश करता है वह मुख संग्राम रूपी यज्ञ में विधिपूर्वक सोमपान करने वाले मुख के तुल्य है ॥४८॥ जो द्विजाति लोग मरे हुए अनाथ ब्राह्मण को श्मशान में ले जाते हैं वे क्रम से पग २ में यज्ञ के फल को प्राप्त होते हैं ॥ ४९ ॥ और उन द्विजों को शुभ