अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ भाषार्थसहिता-
सद्यएवविशुद्धिःस्यान्मृतेतनैवसूतकम् ॥९३॥
कृतचूडेप्रकुर्वीत उदकंपिंडमेवच ।
स्वधाकारंप्रकुर्वीत नामोच्चारणमेवच ॥ ९४ ॥
ब्रह्मचारीयतिश्चैव मन्त्रेपूर्वंक्रृतेतथा ।
यज्ञेविवाहकालेच सद्यःशौचंविधीयते ॥९५॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अन्तरामृतसूतके ।
पूर्वंसंकल्पितार्थस्य नदोषश्चात्रिरब्रवीत् ॥९६॥
मृतसंजननोधुं तु सूतकादौविधीयते ।
स्पर्शनाचमनाच्छुद्धिः सूतिकाञ्चेन्नसंस्पृशेत् ॥९७॥
पंचमेऽहनिविज्ञेयं संस्पर्शंक्षत्रियस्यतु ।
सप्तमेऽहनि वैश्यस्य विज्ञेयंस्पर्शनंबुधैः ॥९८॥
दशमेऽहनि शूद्रस्य कर्तव्यंस्पर्शनंबुधैः ।
और जन्म के दोनों सूतक नहीं लगते अर्थात् दश आदि दिन में शुद्धि का नियम वहां नहीं रहेगा ॥ ९३ ॥ जो मुंडन करने के पीछे बालक का मृत्यु होवे तो पिंड और जल का दान तथा स्वधाकार एवं नाम का उच्चारण करें ॥ ९४ ॥ ब्रह्मचारी-संन्यासी और सूतक से पूर्व मंत्र के जप का अनुष्ठान प्रारंभ करने वाले की तथा यज्ञ और विवाह के समय में, उसी समय शुद्धि होजाती है ॥ ९५ ॥ विवाह-उत्सव और यज्ञ में जो मरण का या जन्म का सूतक होजाय तो पूर्व से संकल्प वस्तु के लेने वा खाने आदि में दोष नहीं यह अत्रि जी ने कहा है ॥ ९६ ॥ यदि मरा हुआ बालक जन्मे तो सूतक के आरंभ में ही जल का स्पर्श तथा आचमन करने से शुद्धि हो जाती है परन्तु सूतिका का स्पर्श न करे तो ॥ ९७ ॥ दोनों प्रकार के सूतक में पांचवें दिन क्षत्रिय का और सातवें दिन वैश्य का स्पर्श करना बुद्धिमानों को जानना चाहिये ॥ ९८ ॥ दशवें दिन शूद्र का स्पर्श बुद्धिमान् करे । परन्तु गरू