अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिसमृतिः ॥ १७
शवस्पृक्प्रस्तृतीयेतु सचैलंस्नानमाचरेत् ।
चतुर्थेसप्तभिक्षंस्या-देषशावविधिःस्मृतः ॥ ८८ ॥
एकत्रसंस्कृतानांतु मातृणामेकभोजिनाम् ।
स्वामितुल्यंभवेच्छौचं विभक्तानांपृथक्पृथक् ॥८९॥
उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरं पक्वान्नंमृतसूतके ।
पावकार्कनवश्राद्धं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् ॥ ९० ॥
सूतकान्नमधर्माय यस्तुप्राश्नातिमानवः ।
त्रिरात्रमुपवासःस्या-देकरात्रंजलेवसेत् ॥ ९१ ॥
महायज्ञविधानंतु नकुर्यान्मृतजन्मनि ।
होमंतत्रप्रकुर्वीत शुष्कान्नेनफलेनवा ॥ ९२ ॥
बालस्त्वन्तर्दशाहैतु पंचत्वंयदिगच्छति ।
जिस तीसरी पीढ़ी के मनुष्य ने शव का स्पर्श किया हो वह सचैल स्नान करे और चौथी पीढ़ी का मनुष्य सात घर की भिक्षा का भक्षण करे—यह शव (मुद्दे) के सूतक की विधि शास्त्र में कही है ॥ ८८ ॥
एक पुरुष के साथ जिस का विवाह संस्कार हुआ और जो एक चौके में नित्य भोजन करती हों ऐसी माताओं को पति की जाति के समान शौच होता है और जो पृथक् २ रहती हों तो अपनी २ जाति का शौच होता है ॥ ८९ ॥
ऊँटनी और भेड़ का दूध तथा मृतसूतक में पक्वान्न और रसोइया का अन्न और नवक श्राद्ध जो सूतक के निमित्त ग्यारहवें दिन होता है इन को खाकर चान्द्रायण व्रत करे ॥ ९० ॥
जो मनुष्य सूतक का अन्न खाता है वह तीन दिन उपवास करे और एक दिन रात जल में रहे क्योंकि मरण या जन्म सम्बन्धी दोनों प्रकार के सूतक वाले का अन्न शुद्धि से पहिले अधर्म का निमित्त होता है ॥ ९१ ॥
मृतक और जन्म के सूतक में पञ्चमहायज्ञ न करे किन्तु उस समय शुष्क अन्न अथवा फल से होम मात्र करे ॥ ९२ ॥
स्त्री अथवा बालक दश दिन के अन्तर्गत ही मृत्यु को प्राप्त हो जावे तो शीघ्र ही शुद्धि होजाती है मरण
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