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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

चतुर्थेसप्तभिक्षंस्या-देषशावविधिःस्मृतः ॥ ८८ ॥

अत्रिसमृतिः ॥ १७

शवस्पृक्प्रस्तृतीयेतु सचैलंस्नानमाचरेत् ।
चतुर्थेसप्तभिक्षंस्या-देषशावविधिःस्मृतः ॥ ८८ ॥
एकत्रसंस्कृतानांतु मातृणामेकभोजिनाम् ।
स्वामितुल्यंभवेच्छौचं विभक्तानांपृथक्पृथक् ॥८९॥
उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरं पक्वान्नंमृतसूतके ।
पावकार्कनवश्राद्धं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् ॥ ९० ॥
सूतकान्नमधर्माय यस्तुप्राश्नातिमानवः ।
त्रिरात्रमुपवासःस्या-देकरात्रंजलेवसेत् ॥ ९१ ॥
महायज्ञविधानंतु नकुर्यान्मृतजन्मनि ।
होमंतत्रप्रकुर्वीत शुष्कान्नेनफलेनवा ॥ ९२ ॥
बालस्त्वन्तर्दशाहैतु पंचत्वंयदिगच्छति ।


जिस तीसरी पीढ़ी के मनुष्य ने शव का स्पर्श किया हो वह सचैल स्नान करे और चौथी पीढ़ी का मनुष्य सात घर की भिक्षा का भक्षण करे—यह शव (मुद्दे) के सूतक की विधि शास्त्र में कही है ॥ ८८ ॥

एक पुरुष के साथ जिस का विवाह संस्कार हुआ और जो एक चौके में नित्य भोजन करती हों ऐसी माताओं को पति की जाति के समान शौच होता है और जो पृथक् २ रहती हों तो अपनी २ जाति का शौच होता है ॥ ८९ ॥

ऊँटनी और भेड़ का दूध तथा मृतसूतक में पक्वान्न और रसोइया का अन्न और नवक श्राद्ध जो सूतक के निमित्त ग्यारहवें दिन होता है इन को खाकर चान्द्रायण व्रत करे ॥ ९० ॥

जो मनुष्य सूतक का अन्न खाता है वह तीन दिन उपवास करे और एक दिन रात जल में रहे क्योंकि मरण या जन्म सम्बन्धी दोनों प्रकार के सूतक वाले का अन्न शुद्धि से पहिले अधर्म का निमित्त होता है ॥ ९१ ॥

मृतक और जन्म के सूतक में पञ्चमहायज्ञ न करे किन्तु उस समय शुष्क अन्न अथवा फल से होम मात्र करे ॥ ९२ ॥

स्त्री अथवा बालक दश दिन के अन्तर्गत ही मृत्यु को प्राप्त हो जावे तो शीघ्र ही शुद्धि होजाती है मरण

१८ भाषार्थसहिता-

सद्यएवविशुद्धिःस्यान्मृतेतनैवसूतकम् ॥९३॥
कृतचूडेप्रकुर्वीत उदकंपिंडमेवच ।
स्वधाकारंप्रकुर्वीत नामोच्चारणमेवच ॥ ९४ ॥
ब्रह्मचारीयतिश्चैव मन्त्रेपूर्वंक्रृतेतथा ।
यज्ञेविवाहकालेच सद्यःशौचंविधीयते ॥९५॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अन्‍तरामृतसूतके ।
पूर्वंसंकल्पितार्थस्य नदोषश्चात्रिरब्रवीत् ॥९६॥
मृतसंजननोधुं तु सूतकादौविधीयते ।
स्पर्शनाचमनाच्छुद्धिः सूतिकाञ्चेन्नसंस्पृशेत् ॥९७॥
पंचमेऽहनिविज्ञेयं संस्पर्शंक्षत्रियस्यतु ।
सप्तमेऽहनि वैश्यस्य विज्ञेयंस्पर्शनंबुधैः ॥९८॥
दशमेऽहनि शूद्रस्य कर्तव्यंस्पर्शनंबुधैः ।


और जन्म के दोनों सूतक नहीं लगते अर्थात् दश आदि दिन में शुद्धि का नियम वहां नहीं रहेगा ॥ ९३ ॥ जो मुंडन करने के पीछे बालक का मृत्यु होवे तो पिंड और जल का दान तथा स्वधाकार एवं नाम का उच्चारण करें ॥ ९४ ॥ ब्रह्मचारी-संन्यासी और सूतक से पूर्व मंत्र के जप का अनुष्ठान प्रारंभ करने वाले की तथा यज्ञ और विवाह के समय में, उसी समय शुद्धि होजाती है ॥ ९५ ॥ विवाह-उत्सव और यज्ञ में जो मरण का या जन्म का सूतक होजाय तो पूर्व से संकल्प वस्तु के लेने वा खाने आदि में दोष नहीं यह अत्रि जी ने कहा है ॥ ९६ ॥ यदि मरा हुआ बालक जन्मे तो सूतक के आरंभ में ही जल का स्पर्श तथा आचमन करने से शुद्धि हो जाती है परन्तु सूतिका का स्पर्श न करे तो ॥ ९७ ॥ दोनों प्रकार के सूतक में पांचवें दिन क्षत्रिय का और सातवें दिन वैश्य का स्पर्श करना बुद्धिमानों को जानना चाहिये ॥ ९८ ॥ दशवें दिन शूद्र का स्पर्श बुद्धिमान् करे । परन्तु गरू

अत्रिसमृतिः ॥ १९

मासेनेवात्मशुद्धिःस्यात् सूतकेमृतकेतथा ॥९९॥
व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा ।
क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥१००॥
व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ।
श्राद्धत्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥१०१॥
द्विकृच्छ्रेपरिवित्तेस्तु कन्यायाःकृच्छ्रमेवच ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रंमातुःस्यात्पितुःसांतपनंकृतम् ॥१०२॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिवेदने ॥१०३॥
क्लीवेदेशान्तरस्थेच पतितेव्रजितेऽपिवा ।
योगशास्त्राभियुक्तेच नदोषःपरिवेदने ॥१०४॥


और जन्म दोनों प्रकार के सूतक में एक महीने में अपनी ( शूद्र की ) शुद्धि होती है ॥ ९९ ॥ रोगी-कृपण, जो सदा ऋणी रहे-क्रिया से हीन-मूर्ख विशेष कर स्त्री ने जिसे जीता हो अर्थात् सदा स्त्री के आधीन जो रहे ॥१००॥ जुआ आदि व्यसनों में जिस का धनादि लगा हो और जो नित्य पराधीन हो-जो कभी भी श्राद्ध के भोजन को न त्यागता हो, इतने मनुष्यों को मृतक के भस्म करने तक सूतक रहता है अर्थात् उन को जीवन पर्यन्त सदा ही सूतक लगा रहता है ॥ १०१ ॥ परिवित्ति ( जिस ने बड़े भाई के विवाह से पहिले अपना विवाह किया हो ) को दो कृच्छ्र व्रत कन्या को एक कृच्छ्र, और कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र कन्या की माता को, और पिता को सांतपन कृच्छ्र करना चाहिये ॥ १०२ ॥ कुबड़ा वामन ( बौना ) षंढ ( नपुंसक ) तोतला, या बला-जन्म से अंधा, बहरा-गूंगा-ऐसे बड़े भाइयों से पहिले छोटा भाई विवाह करे तो कुछ दोष नहीं है ॥ १०३ ॥ नपुंसक, दूर परदेश में रहता हो, पतित, संन्यासी-योगशास्त्र में तत्पर इनके भी परिवेदन में दोष नहीं है १०४

२० भाषार्थसहिता-

पितापितामहोयस्य अग्रजोष्यापिकस्यचित् ।
अग्निहोत्राधिकार्यस्ति नदोषःपरिवेदने ॥१०५॥
भार्य्यामरणपक्षेवा देशान्तरगतेपिवा ।
अधिकारीभवेत्पुत्र-स्तथापातकसंयुगे ॥ १०६ ॥
ज्येष्ठोभ्रातायदानष्टो नित्यंरोगसमन्वितः ।
अनुज्ञातस्तुकुर्वीत शंखस्यवचनंयथा ॥ १०७ ॥
नाग्नयःपरिविन्दन्ति नवेदानतपांसिच ।
नचश्राद्धंकनिष्ठोवै विनाचैवाभ्यनुज्ञया ॥ १०८ ॥
तस्माद्धर्मं सदाकुर्यात्-श्रुतिस्मृत्युदितंचयत् ।
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं यच्चस्वर्गस्यसाधनम् ॥१०९॥
एकैकंवर्धयेन्नित्यं शुक्लेकृष्णेचह्रासयेत् ।
अमावास्यांनभुञ्जीतएषचांद्रायणोविधिः ॥ ११० ॥


जिस का पिता, पितामह या बड़ा भाई अग्निहोत्र का अधिकारी हो उस को बड़े भाई से पूर्व विवाह करने में दोष नहीं है ॥ १०५ ॥ पिता की स्त्री वा पुत्र की माता के मरने पर, पिता के परदेश में जाने पर अथवा पिता को पातक लगने पर पिता के स्थान पर पुत्र अग्निहोत्र आदि कर्मों का अधिकारी होता है ॥१०६॥ यदि बड़ा भाई खोगया हो यद्वा सदा रोगी रहता हो तो उसकी आज्ञा से छोटा भाई शंख ऋषि के वचनके अनुसार विवाहकरके अग्निहोत्रलेनेवे॥१०७॥छोटे भाई ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा के विना न अग्निहोत्र कर सकते, न वेद पढ़ सकते, न तप करसकते, और न श्राद्ध कर सकते हैं ॥ १०८ ॥ अतएव वेद और स्मृतियों में कहे हुए नित्य ( संध्या आदि ) नैमित्तिक ( जात कर्म आदि ) काम्य ( पुत्रेष्टि आदि ) कर्म जो स्वर्ग का साधन ( दान आदि ) रूप धर्म है उसे सदा करे ॥ १०९ ॥ शुक्ल पक्ष में एक२ ग्रास बढ़ावे और कृष्णपक्ष में एक २ ग्रास घटावे एवं अमावास्या को भोजन सर्वथा न करे यह चांद्रायण व्रत की विधि है ॥ ११० ॥

अत्रिस्मृतिः ॥
२२

एकैकंग्रासमश्नीयात् त्र्यहानित्रीणिपूर्ववत् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीया-दतिकृच्छ्रं तदुच्यते ॥ १११ ॥
इत्येतत्कथितंपूर्वै-र्महापातकनाशनम् ।
वेदाभ्यासरतंक्षान्तं महायज्ञक्रियापरम् ॥ ११२ ॥
नस्पृशन्तीहपापानि महापातकजान्यपि ।
वायुभक्षोदिवातिष्ठे-द्रात्रीन्नीत्वाप्सुसूर्यदृक् ॥११३॥
जप्त्वासहस्रंगायत्र्याः शुद्धिस्त्र्यह्वयधाहते ।
पद्मोदुंबरबिल्वान्न कुशाश्वत्थपलाशकाः ॥ ११४ ॥
एतेषामुदकंपीत्वा पर्णकृच्छ्रं तदुच्यते ।
पंचगव्यंचगोक्षीरंदधिमूत्रंशकृद्घृतम् । ११५ ॥
जग्ध्वापरंन्ह्युपवसे-त्कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ।
पृथक्सांतपनैर्द्रव्यैः षडहःसोपवासकः ॥११६॥


प्रथम तीन दिन तक एक २ ग्रास का भोजन करै और अगले तीन दिन में सर्वथा भोजन न करै इस को अतिकृच्छ्र व्रत कहते हैं ॥ १११ ॥ वेदों के अभ्यास में तत्पर तथा कृश और पांच महायज्ञों के करने में रत के लिये पूर्वज ऋषियों ने महापातक के नाश करने वाला यह प्रायश्चित्त कहा है ॥११२॥ जो दिन में सूर्य को देखता हुआ वायु को खाकर रहे और रात्रि को जलों में खड़ा हो व्यतीत करे उस को इस लोक में महापातक से उत्पन्न हुए पाप भी स्पर्श नहीं करते ॥ ११३ ॥ एक हजार गायत्री का जप करके ब्रह्महत्या से भिन्न सब पापों से शुद्धि होती है—कमल–गूलर–बेल–कुशा पीपल और ढाक ॥११४॥ इन के जल को पीकर दिन को व्यतीत करे उसे पर्णकृच्छ्र व्रत कहते हैं पंच गव्य ये हैं कि गौका दूध दही, मूत्र, गोबर—घी ॥ ११५ ॥ इन को प्रथम दिन खाकर अगले एक दिन उपवास करे इसे सांतपनकृच्छ्र कहते हैं—सांतपनकृच्छ्र के पञ्चगव्य तथा कुशोदक इन छः पदार्थों को क्रमशः एक २ दिन खाकर छः दिन व्यतीत करे और एक सातवें दिन उपवास करे ॥ ११६ ॥

२२भाषाऽर्थसहिता-

सप्ताहेनतुकृच्छ्रोयं महासांतपनंस्मृतम् ।
त्र्यहंसायं त्र्यहंप्रातस्त्र्यहंभुङ्क्तत्वयाचितम् ॥११७॥
त्र्यहंपरंचनाश्नीयात्प्राजापत्योविधिःस्मृतः ।

सायंतुद्वादशग्रासाः प्रातःपंचदशस्मृताः ॥११८॥
अयाचितैश्चतुर्विंश परैस्त्वनशनंस्मृतम् ।
कुक्कुटाण्डप्रमाणंस्याद् यावद्वास्याविशेन्मुखे ॥११९॥
एतद्ग्रासंविजानीया-च्छुद्ध्यर्थं कायशोधनम् ।

त्र्यहमुष्णंपिवेदाप-स्त्र्यहमुष्णंपिवेत्पयः ॥ १२० ॥
त्र्यहमुष्णंघृतंपीत्वा वायुभक्षोदिनत्रयं ।

षट्पलानि पिवेदाप-स्त्रिपलं तुपयः पिवेत्* ॥१२१॥
पलमेकंतुवैसर्पि-स्तप्तकृच्छ्रं विधीयते ।

त्र्यहंतुदधिनाभुङ्क्ते त्र्यहंभुङ्क्तेचसर्पिषा ॥१२२॥


यह सात दिन में महासांतपनकृच्छ्र कहा है तीन दिन सायंकाल में तीन दिन प्रातःकाल में भोजन करे तथा तीन दिन बिना मांगे जो मिले उसे भोजन करे ॥ ११७ ॥ और अन्त के तीन दिनों में सर्वथा भोजन न करे यह प्राजापत्य की विधि कही है--सायंकाल को बारह ग्रास और प्रातःकाल को पन्द्रह कहे हैं ॥११८॥ बिना याचना के तीन दिनों में चौबीस ग्रास खाने से श्रेष्ठ ऋषियों ने अनशन व्रत कहा है मुर्गे के अण्डे के समान एक ग्रास का प्रमाण होवे अथवा जितना व्रती के मुख में मापके वही उसका एक ग्रास है ॥ ११९ ॥ शुद्धि के अर्थ इसे ग्रास जाने और यही देह की शुद्धि करने वाला है-तीन दिन गर्म जल पीवे और तीन दिन गर्म दूध पीवे ॥ १२० ॥ तीन दिन गरम घी पीकर अन्त के-तीन दिन वायु का भक्षण करे, छः पल जल पीवे और तीन पल दूध पीवे ॥ १२१ ॥ एक पल घी पीवे इसे तप्त-कृच्छ्रव्रत कहते हैं-तीन दिन दही भोजन करे और तीन दिन घी ॥ १२२ ॥

* चार तोला का एक पल कहाता है ॥

अत्रिसमृतिः ॥ =३

क्षीरेणत्र्यहंभुङ्क्ते वायुभक्षोदिनत्रयम् । त्रिपलं दधिक्षीरेण पलमेकंतुसर्पिषा ॥१२३॥ एतदेवव्रतंपुण्यं वैदिकंकृच्छ्रमुच्यते । एकभक्तेननक्तेन तथैवायाचितेनच ॥१२४॥ उपवासेनचैकेन पादकृच्छ्रं प्रकीर्तितम् । कृच्छ्रातिकृच्छ्रः पयसा दिवसानेकविंशतिः ॥१२५॥ द्वादशाहापवासेन पराकःपरिकीर्तितः । पिण्याकश्चामतक्रांबु सक्तूनांप्रतिवासरम् ॥ १२६ ॥ एकैकमुपवासःस्या-त्सौम्यकृच्छ्रःप्रकीर्तितः । एषां त्रिरात्रमभ्यासा-देकैकस्ययथाक्रमम् ॥ १२७ ॥ तुलापुरुषइत्येष ज्ञयःपंचदशान्हिकः । कपिलायास्तुदुग्धाया धारोष्णंयत्पयःपिबेत् ॥ १२८ ॥ एषश्यामकृतःकृच्छ्रः श्वपाकमपिशोधयेत् । निशायांभोजनंचैव तज्ज्ञेयंनक्तमेवतु ॥ १२९ ॥


तीन दिन दूध को और तीन दिन वायु को भक्षण करे, दही और दूध तीन २ पल और घी एक पल भोजन करे ॥१२३॥ यही पवित्र और वेदोक्त कृच्छ्रव्रत कहा है-एक दिन हविष्य वस्तु का भोजन करे द्वितीयदिनबिना मांगे जो पदार्थ मिलेउसकाभोजन करे ॥१२४॥ और एक तीसरे दिन अन्त में उपवास करने से यह तीन दिन का पादकृच्छ्र कहा है-दूध को ही पीकर इक्कीसदिन बिताने से कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत कहा है १२५॥ बारह दिन के उपवास से पराक व्रत कहा है, खली-कच्चामठा जल और सत्तू इन को क्रम से एक २ दिन खावे।१२६। और एक उपवास करै इसे सौम्यकृच्छ्र कहते हैं। इन पांचों में से एक २ के तीन दिन क्रम से अभ्यास करने से ॥१२७॥ यह पंद्रह दिन का तुला पुरुषव्रत है दुही हुई कपिला गौ के धारोष्ण दूध को जो पीवे ॥१२८॥ यह श्याम जी कृत (किया) कृच्छ्रव्रत चांडाल को भी शुद्ध करता है रात्रि में ही जो भोजन हो उसे नक्त कहते हैं ॥ १२९ ॥

३४ भाषार्थसहिता

अनादिष्टेषुपापेषु चान्द्रायणमथोदितम् ।
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टैर्द्विगुणदक्षिणैः ॥ १३० ॥
यत्फलंसमवाप्नोति तथाकृच्छ्रैस्तपोधनाः ।
वेदाभ्यासरतःक्षान्तो नित्यंशास्त्राण्यवेक्षयेत् ॥ १३१ ॥
शौचमृद्वार्यभिरतो गृहस्थोपिहिमुच्यते ।
उक्तमेतद्विजातीनां महर्षेब्रूयतामिति ॥ १३२ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि स्त्रीशूद्रपतनानिच ।
जपस्तपस्तीर्थयात्रा प्रव्रज्यामन्त्रसाधनम् ॥ १३३ ॥
देवताराधनंचैव स्त्रीशूद्रपतनानिषट् ।
जीवद्भर्त्तरियानारी उपोष्यव्रतचारिणी ॥ १३४ ॥
आयुष्यंहरतेभर्तुः सानारीनरकंव्रजेत् ।
तीर्थस्नानार्थिनी नारी पतिपादोदकंपिबेत् ॥ १३५ ॥


अनादिष्टपापों (जिन का शास्त्र में प्रायश्चित नहीं है) की शुद्धि में चांद्रायण कहा है—दुगुणा दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि यज्ञों के करने से ॥ १३० ॥ जिस फलों को प्राप्त होता है उन्हीं फलों को कृच्छ्रों के करने से हे तपस्वियो ! मनुष्य प्राप्त होता है और वेद के पढ़ने में तत्पर दुर्घम और नित्य शास्त्र के देखने वाले को भी वही फल मिलता है ॥ १३१ ॥ जो गृहस्थी शुद्ध मिट्टी और जल से शौच करता है वह पापों से मुक्त हो जाता है हे महर्षियो ! तुम सुनो यह द्विजातियों का धर्म कहा है ॥ १३२ ॥ इस से आगे स्त्री और शूद्रों के पतित होने के कारणों को कहेंगे जप—तप—तीर्थों की यात्रा—संन्यास मंत्र की सिद्धि करना ॥ १३३ ॥ और देवताओं की आराधना ये छः कर्म स्त्री और शूद्रों के पतन के हेतु हैं जो स्त्री पति के जीते हुए उपवास व्रत करती है ॥ १३४ ॥ वह अपने पति की अवस्था को न्यून करती है और स्वयं नरक को जाती है यदि स्त्री को तीर्थ के स्नान की इच्छा हो तो अपने पति के चरणों को धोकर पीवे ॥ १३५ ॥

अत्रिसृतिः ॥ २५

शंकरस्यापिविष्णोर्वा प्रयातिपरमंपदम् । जीवद्भर्तरिवामाङ्गी मृतेवापिसुदक्षिणे ॥ १३६ ॥ श्राद्धे यज्ञेविवाहेच पत्नीदक्षिणतःसदा । सोमःशौचंददौतासां गंधर्वाश्चतथाऽगिराः ॥ १३७ ॥ पावकःसर्वमेध्यंच मेध्यंवैयोषितांसदा । जन्मनाब्राह्मणोज्ञेयः संस्कारैर्द्विजउच्यते ॥१३८॥ विद्ययायातिविप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेवच । वेदशास्त्राण्यधीत्यैयः शास्त्रार्थंचनियोधयेत् ॥१३९॥ तदासौवेदविद्रोक्तो वचनंतस्यपावनम् । एकोऽपिवेदविद्धर्मं यंव्यवस्येद्द्विजोत्तमः ॥१४०॥ सज्ञेयःपरमोधर्मो नाज्ञानामयुतायुतैः । पावकाइवदीप्यन्ते जपहोमैर्द्विजोत्तमाः ॥१४१॥


भावार्थ—तथा शिव विष्णु की प्रतिमा के चरणोदक को श्रद्धा से पीवे तो भी वह परम पद नाम मोक्ष को प्राप्त होती है—पतिके जीते हुए स्त्री वाम अंग में स्थित होती है और पति के मरे पीछे दक्षिण अंग में ॥ १३६ ॥ श्राद्ध-य-ज्ञ और विवाह में सदा पत्नी दक्षिण की ओर बैठती है चन्द्रमा गन्धर्व और अंगिरा ( बृहस्पति ) ने उन स्त्रियों को शौच ( शुद्धता ) दियो है ॥१३७॥ और अग्नि ने सब अंगों को पवित्रता दी है इसी से स्त्रियों को सदा पवि-त्रता है—जन्मसे ब्राह्मण संज्ञा होती है—औरसंस्कारों से द्विज कहाताहै ॥१३८॥ विद्या के पढ़ने से विप्रत्व को प्राप्त होता तथा जन्म, यज्ञोपवीत, और वेद विद्या से श्रोत्रिय संज्ञा होती है जो वेद और शास्त्र को पढ़े और शास्त्र के अर्थ को बतावे ॥ १३९ ॥ उस ब्राह्मण को वेदवित् कहते हैं उस का वचन प-वित्र करने वाला है एक भी वेद का जानने वाला ब्राह्मण जिस धर्म का निर्णय करदे ॥ १४० ॥ वही परम धर्म जानना चाहिये तथा मूर्खों के दश सहस्रों के दश सहस्र भी मिलके कहें वह धर्म नहीं जानना चाहिये—जप और होम करने से ब्राह्मण लोग अग्नि के समान तेजस्वी होते हैं ॥१४१॥

२६ भाषार्थसहिता ॥

प्रतिग्रहेणनश्यन्ति वारिणेवावपावकः । तान्प्रतिग्रहजान्दोषान्-प्राणायामैर्द्विजोत्तमाः ॥१४२॥ नाशयन्तिहि विद्वांसो वायुर्मेघानिवाम्बरे । भुक्तमात्रोयदाविप्र आर्द्रपाणिस्तुतिष्ठति ॥१४३॥ लक्ष्मीर्बलंयशस्तेज आयुश्चैवप्रहीयते । यस्तुभोजनशालाया-मासनस्थउपस्पृशेत् ॥१४४॥ तच्चान्नंनैवभोक्तव्यं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् । पात्रोपरिस्थितेपात्रे यस्तुरुत्थाप्यउपस्पृशेत् ॥१४५॥ तस्यान्नंनैवभोक्तव्यं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् । नदेवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवतिनिष्फलम् ॥१४६॥ हस्तंप्रक्षालयित्वायः पिवेद्भुक्त्वा द्विजोत्तमः । तदन्नमसुरैर्भुक्तं निराशाःपितरोगताः ॥ १४७ ॥


भा० प्रतिग्रह लेने से ब्राह्मण ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे जल से अग्नि, उन प्रतिग्रह से उत्पन्न हुए दोषों को ब्राह्मण लोग प्राणायामों से ॥१४२॥ ऐसे नष्ट करते हैं जैसे आकाश में मेघों को वायु-जो ब्राह्मण भोजन करने के अनन्तर आर्द्र (गीले) हाथ रक्खे ॥१४३॥ तो लक्ष्मी-बल-यश-तेज-और अवस्था ये पांचों उस के नष्ट हो जाते हैं। जो भोजन के स्थान में आसन पर स्थित हुआ भोजन करते समय अन्न को छुवे ॥१४४॥ तो उस अन्न को फिर स्वयं वा अन्य न खाये और खाय तो चान्द्रायण व्रत करे-पात्र के ऊपर रक्खे हुए पात्र का जो स्पर्श करे ॥१४५॥ तो उस पात्र के अन्न को भी भक्षण न करे और भक्षण करले तो चान्द्रायण व्रत करे, न तो उस के देवता तृप्त होते और दाता का दिया दान भी निष्फल होता है ॥१४६। हे ऋषि लोगो ! जो पुरुष भोजन करके पश्चात् हाथों को धोकर उसी जल को पीता है उन के श्राद्ध के अन्न को मानो राक्षसों ने खाया और पितर निराश गये ॥ १४७ ॥

अङ्गिरस्स्मृतिः ॥ २७

नास्तिवेदात्परंशास्त्रं नास्तिमातुःपरोगुरुः । नास्तिदानात्परंमित्र-मिहलोकेपरत्रच ॥ १४८ ॥ अपात्रेष्वपियद्दत्तं दहत्यासप्तमंकुलम् । हव्यंदेवानगृह्णन्ति कव्यंचपितरस्तथा ॥ १४९ ॥ आयसेनतुपात्रेण यदन्नमुपदीयते । श्वानविष्ठासमंभुङ्क्ते दाताचनरकंव्रजेत् ॥१५०॥ पित्तलेनतुपात्रेण दीयमानंविचक्षणः । नदद्याद्वामहस्तेन आयसेनकदाचन ॥ १५१ ॥ मृन्मयेषुचपात्रेषु यःश्राद्धेभोजयेत्पितॄन् । अन्नदाताचभोक्ताच तावेवनरकंव्रजेत् ॥ १५२ ॥ अभावेमृन्मयंदद्या-दनुज्ञातन्तुतैर्द्विजैः । तेषांवचःप्रमाणंस्याद् यदन्नंचातिरिक्तकम् ॥१५३॥


इस लोक तथा परलोक में वेद से परे शास्त्र नहीं और माता से परे माननीय गुरु नहीं है तथा इस जन्म वा जन्मान्तर में दान से परे कोई मित्र नहीं है ॥ १४८ ॥ जो दान कुपात्र को दिया है वह दान सात पीढ़ी तक कुल को दग्ध ( नष्ट ) करता है तथा कुपात्र को दिये हव्य को देवता, और कव्य को पितर ग्रहण नहीं करते हैं ॥ १४९ ॥ लोहे के पात्र से जो अन्न परसा जाता है उस अन्न को भोजन करने वाला कुत्ते की विष्ठा के तुल्य खाता है और उस अन्न का दाता नरक को जाता है १५०॥ बुद्धिमान् पुरुष पीतल और लोहे के पात्र में रखकर तथा बांये हाथ से, कदाचित् भी न देवे ॥ १५१ ॥

जो पुरुष श्राद्ध के समय मिट्टी के पात्रों में पितृ ब्राह्मणों को भोजन कराता है वह अन्न का दाता और भोक्ता दोनों नरक में जाते हैं ॥ १५२ ॥ शास्त्रोक्त पात्र के अभाव में उन ब्राह्मणों की आज्ञा से मिट्टी के पात्र में ही अन्न को परसदे और जो अन्न ब्राह्मणों के भोजन से बचे उस के लिये पितृ ब्राह्मण लोग जैसी आज्ञा दें वैसा करे क्यों कि उन का ही वचन प्रमाण है ॥ १५३ ॥

२८ | भाषार्थसहिता ॥

सौवर्णायसताम्रेषु कांस्यरौप्यमयेषुच ।
भिक्षादातुर्नधर्मोस्ति भिक्षुर्भुङ्क्तेतुकिल्विषम् ॥१५४॥
नचकांस्येषुभुञ्जीया-दापद्यपिकदाचन ।
मलाशाःसर्वएवैते यतयःकांस्यभोजनाः ॥ १५५ ॥
कांस्यकस्यचयत्पात्रं गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्यभोजीयतिश्चैव प्राप्नुयात्किल्विषंतयोः ॥१५६॥
अत्राप्युदाहरन्ति
सौवर्णायसताम्रेषु कांस्यरौप्यमयेषुच ।
भुञ्जन्भिक्षुर्वैदुःष्येत दुष्येच्चैवपरिग्रहे ॥ १५७ ॥
यतिहस्तेजलंदद्या-द्भिक्षांदद्यात्पुनर्जलम् ॥
तदन्नंमेरुणांतुल्यं तज्जलंसागरोपमम् ॥ १५८ ॥
चरेन्माधुकरींवृत्ति मपिम्लेच्छकुलादपि ।


उस बचे अन्नको यदि सोने-लोहे-तांबे वा चांदीके पात्रमें भिखारी को देय तो भिक्षा के दाता का कुछ धर्म नहीं है और भिखारी पाप का भोक्ता होता है॥१५४॥
संन्यासी पुरुष आपत्ति कालमेंभी कांसीके पात्र में भोजन कदापि न करे क्योंकि जो संन्यासी कांसे के पात्र में भोजन करने वाले हैंवे संपूर्ण मल के खाने वाले हैं ॥१५५॥
जो कांसे वालेका पात्र हो और गृहस्थी का पात्र किसी धातु का हो उस में यदि संन्यासी भोजन करै तो उनदोनों के दोष को प्राप्त होता है ॥१५६॥
इस विषय में और ऋषि भी कहते हैं कि-सोने-लोहे-तांबे कांसे और चांदी के पात्रों में भोजन करता हुआ संन्यासी दूषित होता और भोग के पदार्थों का संचयऔर रक्षा करने से भी संन्यासी दूषित हो जाता है ॥ १५७ ॥
संन्यासी के हाथमें पहिले कुल्लादि के लिये जल दे फिर भिक्षा दे और फिर जल दे [अर्थात् किसी पात्रमें जल वा भिक्षा न देवे] वह अन्न मेरु तुल्य और जल समुद्रके तुल्य अनन्त फल देनेवाला होता है ॥१५८ ॥
संन्यासी पुरुष भले ही बृहस्पति के तुल्य बड़ा विद्वान् प्रविष्ट ज्ञानी हो तोभी अनेक उत्तम कुलीन ब्राह्मणादि

अत्रिस्मृतिः ॥ २९

एकान्नं नैवभोक्तव्यं बृहस्पतिसमोयदि ॥ १५९ ॥ अनापदिचरेद्यस्तु सिद्धं भैक्षंगृहेवसन् । दशरात्रंपिबेद्वज्र-मापस्त्रयहमेवच ॥ १६० ॥ गोमूत्रेणतुसंमिश्रं यवकंघृतपाचितम् । एतद्वज्रमितिप्रोक्तं भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ १६१ ॥ ब्रह्मचारीयतिश्चैव विद्यार्थीगुरुपोषकः । अध्वगःक्षीणवृत्तिश्च षडेतेभिक्षुकाःस्मृताः ॥ १६२ ॥ षण्मासान्कामयेन्मर्त्यो गुर्विणीमेववैस्त्रियम् । आदन्तजननादूर्ध्वं एवंधर्मोनहीयते ॥ १६३ ॥ ब्रह्महाप्रथमंचैव द्वितीयंगुरुतल्पगः । तृतीयंतुसुरापेयं चतुर्थंस्तेयमेवच ॥ १६४ ॥ आमांवस्त्रंतिलान्भूमिं गन्धंवासयतेतथा ।


के घर न मिलने पर भले ही नीच म्लेच्छों के घर से भी मधूकरा एक २ (रोटी) मांग कर खावे परन्तु किसी एक घर का भोजन कदापि न करे ॥१५९॥ जो संन्यासी आपत्काल के बिना घर में बसता हुआ सिद्ध (बनी बनाई) भिक्षा को खाता है वह दश रात्र तक वज्र को पीवे और तीन दिन केवल जल पीवे (तब शुद्ध होता है) ॥१६०॥ गो मूत्र जिसमें मिला हो ऐसे घी में पकाये जौ के चून को वज्र कहते हैं यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥१६१॥ ब्रह्मचारी,-संन्यासी,-विद्यार्थी,-भिक्षान्न से गुरु का रक्षक, मार्ग में चलने वाला-और जिसकी कोई जीविका न हो ये छः६ भिक्षुक कहाते हैं ॥ १६२ ॥ गर्भवतो स्त्री के संग छ महीने तक मनुष्य विषय करै और बालक के होने पर बालक के दांत उपजने के पश्चात् विषय करै इस प्रकार धर्म नष्ट नहीं होता है ॥ १६३ ॥ बालक के जन्म के पश्चात् प्रथम मास में ब्रह्महत्या का-दूसरे मास में गुरु की शय्या में गमन करने का, तृतीय मास में मदिरा पान का-चतुर्थ मास में चोरी करने का-दोष लगता है ॥ १६४ ॥ बिना रंगा वस्त्र-तिलकां भूमि का

३७ भाषाऽर्थसहिता ॥

पापानांचैवसंसर्गः पञ्चकंपातकंमहत् ॥ १६५ ॥
एषामेवविशुद्ध्यर्थं चरेत्कृच्छ्राण्यनुक्रमात् ।
त्रीणिवर्षाण्यकामश्चेद् ब्रह्महत्यापृथक् पृथक् ॥१६६॥
अर्द्धंतुब्रह्महत्यायाः क्षत्रियेषुविधीयते ।
षड्भागोद्वादशश्चैव तथाविट्शूद्रयोर्भवेत् ॥ १६७ ॥
त्रीन्मासान्नक्तमश्नीया-द्भूमौशयनमेवच ।
स्त्रीघातीशुध्यतेऽप्येवं चरेत्कृच्छ्राब्दमेववा ॥ १६८ ॥
रजकःशैलुषश्चैव वेणुकर्मोपजीविनः ।
एतेषांयस्तुभुङ्क्ते वै द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ १६९ ॥
सर्वान्त्यजानांगमने भोजनेसंनिवेशने ।
पराकेणविशुद्धिःस्याद् भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ १७० ॥
चाण्डालभाण्डेयत्तोयं पीत्वाचैवद्विजोत्तमः ।
गोमूत्रयावकाहारः सप्तषट्त्रिंशदहान्यपि ॥ १७१ ॥


संग्रह-सुगन्ध का लगाना पापियों का मेल ये पांच बड़े पातक संन्यासी के हैं ॥ १६५ ॥ इन की ही शुद्धि के अर्थ क्रम से तीन वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करै- और यदि कृच्छ्र करने की इच्छा न हो तो पृथक् २ ब्रह्महत्या लगती है ॥१६६॥ छत्री को आधी ब्रह्महत्या, और वैश्य को छठा भाग, और शूद्र को बारहवां भाग ब्रह्महत्या का लगता है ॥ १६७ ॥ जिस ने स्त्री की हत्या की हो वह मनुष्य तीन मास तक रात्रि में ही भोजन करै, पृथवी पर सोवे अथवा एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करै इस प्रकार करने से शुद्ध होता है ॥ १६८ ॥ धोबी-नट और बांसों से जीविका करने वाले, इन के अन्न को जो द्विज भक्षण करता है वह चान्द्रायणव्रत करै ॥ १६९ ॥ सब अंत्यज स्त्रियों के साथ गमन करने उन के साथ भोजन करने और संग बैठने से पराक व्रत से शुद्धि होती है यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥ १७० ॥ जो ब्राह्मण चाण्डाल के पात्र में जल पीलेवे तो ४३ दिन तक गोमूत्र और जौ को खाकर शुद्ध होता है ॥ १७१ ॥

अत्रि स्मृतिः ॥ ३१

संस्पृष्टंयस्तुपक्वान्न-मन्त्यजैर्वाप्युदक्यया । अज्ञानाद्ब्राह्मणोऽश्नीयात् प्राजापत्यार्द्धमाचरेत् ॥१७२॥ चाण्डालान्नंयदाभुङ्क्ते चातुर्वर्ण्यस्यनिष्कृतिः। चान्द्रायणंचरेद्विप्रः क्षत्रःसांतपनंचरेत् ॥ १७३ ॥ षड्ऱात्रमाचरेद्वैश्यः पंचगव्यंतथैव च । त्रिरात्रमाचरेच्छूद्रो दानंदत्त्वाविशुध्यति ॥ १७४ ॥ ब्राह्मणोवृक्षमारूढ-श्चाण्डालोमूलसंस्पृशः। फलान्यत्तिस्थितस्तत्र प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १७५ ॥ ब्राह्मणान्समनुप्राप्य सवासाःस्नानमाचरेत् । नक्तभोजीभवेद्विप्रो घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥१७६॥ एकवृक्षसमारूढ-श्चाण्डालोब्राह्मणस्तथा । फलान्यत्तिस्थितस्तत्र प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १७७ ॥ ब्राह्मणान्समनुज्ञाप्य सवासाःस्नानमाचरेत् ।


चाण्डालादि नीच व रजस्वला स्त्री के स्पर्श किये हुए पक्वान्न को यदि अज्ञान में ब्राह्मण खालेतो ६ दिन आधे प्राजापत्य व्रत को करे ॥१७२॥ यदि चांडाल के अन्न को चारों वर्ण खावें तो उन का क्रम से यह प्रायश्चित्त है कि ब्राह्मण चांद्रायण व्रत करे क्षत्रिय सांतपन करै ॥१७३॥ छः दिन तक वैश्य पंचगव्य को भक्षण करै, और शूद्र तीन दिन व्रत करे व्रत की समाप्ति में ब्राह्मणादि सब लोग यथाशक्त दान देकर शुद्ध होजाते हैं ॥ १७४ ॥ जो ब्राह्मण वृक्ष के ऊपर चढ़ा हो और चांडाल उस वृक्ष की जड़ को छू रहा हो तथा ब्राह्मण उस वृक्ष के फलों को खारहा हो तो ऐसी अवस्था में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १७५ ॥ ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर वस्त्रों सहित स्नान करे और दिन में उपवास करके रात्रिको भोजन करे पश्चात् घृत को खाकर ब्राह्मण शुद्ध होता है ॥१७६॥ यदि चांडाल और ब्राह्मण दोनों एक वृक्षपर चढ़े हुए वृक्ष के फलों को खा रहे हों तो वहां प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥ १७७ ॥ ब्राह्मण अन्य ब्राह्मणों की आज्ञा से सचैलस्नान करके एक दिन रात उपवास करे फिर पंच-

३२भाषाधर्मसंहिता ।

अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १७८ ॥
एकशाखासमारूढ - श्चाण्डालोब्राह्मणोयदा ।
फलान्यत्तिस्थितस्तत्र प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १७९ ॥
त्रिरात्रोपोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्त्रियोम्लेच्छस्यसंपर्कान् शुद्धिःसांतपनेतथा ॥१८०॥
तप्तकृच्छ्रं पुनःकृत्वा शुद्धिरैषाविधीयते ।
संवर्तेतयथाभार्यां गत्वाम्लेच्छम्यसंगताम् ॥१८१॥
सचैलंस्नानमादाय घृतस्यप्राशनेनच ।
केशकीटनखस्नायु अस्थिकंटकमेवच ॥ १८२ ॥
स्पृष्टोनद्युदकेस्नात्वा घृतं प्राश्यविशुद्ध्यति ।
संगृहीतामपत्यार्थ - मन्यैरपितथापुनः ॥ १८३ ॥
चाण्डालम्लेच्छश्वपच कपालव्रतधारिणः ।
अकामतःस्त्रियोग वा पराकेणविशुद्ध्यति ॥१८४॥


गव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ १७८ ॥ यदि एक ही शाखा पर चढ़े हुए ब्राह्मण और चांडाल फलों को खाते हों तो ऐसी दशा में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १७९॥ ब्राह्मण तीन दिन तक उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है और म्लेच्छ की स्त्री के साथ संग करने पर सांतपन कृच्छ्र व्रत करने से शुद्धि होती है ॥१८०॥ फिर तप्त कृच्छ्र करे यह शुद्धि शास्त्रों में कही है-यदि किसी की स्त्री को कोई म्लेच्छ ले गया मात्र हो किन्तु दूषित न किया हो तो उस स्त्री के पास जाके उसे लाकर ऐसा बर्ताव करे कि ॥ १८१ ॥ वस्त्रों सहित स्नान कराके केवल घृत खिलावे तथा केश कीट-नख-स्नायु-अस्थि ( हाड़ ) कांटे ॥ १८२ ॥ इन का स्पर्शकरावे तथानदी के जलमें स्नान और घृत को भक्षण करानेसे शुद्ध होती है-तथा संतानोत्पत्ति के लिये अन्य किसी मनुष्य ने पकड़ी मात्र स्त्री का भी यही उक्त प्रायश्चित्त कराना चाहिये ॥ १८३ ॥ चांडाल-म्लेच्छ-श्वपच कपाल व्रत के धारण करने वाले ( अघोरी ) इनकी स्त्रियों के साथ इच्छा के बिना संग करके पराक व्रत से विशेष कर शुद्धि होती है ॥ १८४ ॥

अत्रिसमृतिः ॥ ३३

कामतस्तुप्रसूतोवा तत्समोनात्रसंशयः ।
सएवपुरुषस्तत्र गर्भोभूत्वाप्रजायते ॥ १८५ ॥

तैलाभ्यक्तोघृताभ्यक्तो विण्मूत्रंकुरुतेद्विजः ।
तैलाभ्यक्तोघृताभ्यक्त-श्चाण्डालंस्पृशतेद्विजः ॥१८६॥

अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ।
शशस्यास्थिजम्बूकास्थीनि नखशुक्तिकपर्द्दिकाः ॥१८७॥

होमतप्तघृतंपीत्वा तत्क्षणादेवनश्यति ।
गोकुलेकंदुशालायां तैलचक्रेक्षुयंत्रयोः ॥१८८॥

अमीमांस्यानिरीौचानि स्त्रीणांचव्याधितस्यच ।
नस्त्रीदुष्यतिजारेण ब्राह्मणोवेदकर्मणा ॥ १८६ ॥

नापोमूत्रपुरीषाभ्यां नाग्निर्दहतिर्क्रमणा ।


में पूर्वोक्त स्त्रियों के साथ संग करे तो अथवा संतान के उत्पन्न होने पर उन स्त्रियों की ही समान जाति होजाते हैं इस में संशय नहीं है क्योंकि वह पुरुष ही गर्भ रूप होकर उत्पन्न होता है ॥ १८५ ॥ जो द्विज तेल अथवा घृत से उबटना करके शौच को जाता अथवा लघुशंका करता है वा चांडाल का स्पर्श करता है ॥१८६॥ वह एक दिन रात उपवासकर के पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है कछुआ और-गीदड़ की हड्डी नख, गीली सीपी-और कौड़ी इनके स्पर्शमे जो दोष लगता है । १८७। वह होम के उष्ण घी के पीने से उसी क्षण नष्ट हो जाता है । गौओं के झुंड-कंदुशाला ( भाड़ ) में-तेल निकालने के ( कोल्हू ) में और गन्ने के यंत्र ( कोल्हू ) में । १८८ । स्त्रियां और रोग की अवस्था में शुद्धता का विचार नहीं करना अर्थात् ये सब सर्वदा शुद्ध ही हैं स्त्री जार से [ अर्थात् मन के चञ्चलायमान होने मात्र से स्त्री ऐसी दूषित नहीं होती जो त्याग दी जावे । सो मनु जी ने लिखा है कि-( रजसास्त्रीमनोदुष्टा ) कि चाहीय दूषित भी जावे ] और ब्राह्मण वेदोक्त कर्म [ लोक विरुद्ध ] करने पर भी दूषित नहीं होते ॥ १८६ ॥ मूत्र और विष्ठा के पड़ने से जल ( नदी क्षीरोद न-

( १८८ । १८९ ) यदि स्त्री को दोष न लगे तो पतिव्रता की महिमा वा प्रशंसा भी व्यर्थ हो जावे। इस कारण इन श्लोकों का अभिप्राय यह है कि

३४ भाषाधर्मसंहिता-

पूर्व्वस्त्रियः सुरैर्भुक्ता सोमगन्धर्व्ववह्निभिः ॥ १८० ॥
भुञ्जतेमानवाःपश्चा-न्नवाहुष्यंतिकर्हिचित् ।
असवर्णस्तुयोगर्भः स्त्रीणांयोनौ निषिच्यते ॥१८१॥
अशुद्धासाभवेन्नारी यावद्गर्भं नमुंचति ।
विमुक्ते तुततःशल्येर जश्चापिप्रदृश्यते ॥ १८२ ॥
तदास्राशुद्ध्यतेनारी विमलं कांचनंयथा ।
स्वयंविप्रतिपन्नाया यदिवाविप्रतारिता ॥ १८३ ॥
बलान्नारीप्रभुक्तावा चौरभुक्तातथापिवा ।
नत्याज्यादूषितानारी नकामोस्याविधीयते ॥१८४॥


हाग आदि) और दुर्गन्ध्यादि को जलाने से भी अग्नि दूषित नहीं होते प्रथम कन्या की दशा कुमारीपन में चन्द्रमा गन्धर्व-और अग्नि देवता स्त्रियों के पति हो चुकते हैं ॥ १८० पीछे से मनुष्य के साथ विवाह होता पर वे स्त्री दूषित नहीं होतीं-जो असवर्णा (भिन्न जाति का) गर्भ स्त्री की योनि में सींचा जाता है ॥ १८१ ॥ वह स्त्री इतने दिन तक अशुद्ध होती है कि जब तक गर्भ को न त्यागे और गर्भत्याग के के पश्चात् जो रज दीखे (मासिक-धर्म हो) ॥ १८२ ॥ तब वह स्त्री इस प्रकार शुद्ध होजाती है जैसा कि निर्मल सोना । अपने आप किसी मनुष्य के समीप जाने से संग दोष लगा हो वा कोई छल से ले गया हो ॥ १८३ ॥ अथवा बल पूर्वक वा चोर ने भोगी हो ऐसी दूषित स्त्री का त्याग न करे क्योंकि स्त्री की कामना से यह काम नहीं हुआ है ॥ १८४ ॥
स्त्रियां प्रायः मूर्ख अजान होती हैं इस से अबोधबालक के समान उन को साधारण अपराधों में त्याग नहीं देना चाहिये । (सोमः प्रथमो विविदे०) इसवेदमन्त्र का आशय यहां दिखाया गया है ।
(१८१-१८४) धर्मशास्त्रों की सब बातें सब काल के लिये नहीं होतीं इस के अनुसार प्राचीन काल में काम क्रोध लोभ स्त्री पुरुषों में बहुत कम थे और धर्म अधिक था । तथा राज प्रबन्ध भी ऐसा अब का सा नहीं था । शुद्धान्तः करण वालों को कमल के पत्ते पर जल न लगने के तुल्य दोष नहीं लगते । पर अब वैसे शुद्ध धर्मनिष्ठ स्त्री पुरुष नहीं रहे इस कारण अब अन्य जाति के गर्भ तथा व्यभिचार से स्त्री पतित हो जाती है ।

अत्रिसमृतिः ॥ ३५

ऋतुकालउपासीत पुष्पकालेनशुद्ध्यति ।
रजकश्चर्मकारश्च नटोबुरुडएवच ॥ १९५ ॥
कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैतेऽन्त्यजाःस्मृताः ।
एषांगत्वास्त्रियोमोहा-त्भुक्तवाचप्रतिगृह्यच ॥१९६॥
कृच्छ्राब्दमाचरेद्ज्ञाना-दज्ञानादेव तद्द्वयम् ।
सकृद्भुक्तातुयानारी म्लेच्छैःसापापकर्मभिः ॥१९७॥
प्राजापत्येनशुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेनतु ।
बलोद्धृतास्वयंवापि परप्रेरितयायदि ॥१९८॥
सकृद्भुक्तातुयानारी प्राजापत्येनशुद्ध्यति ।
प्रारब्धदीर्घतपसां नारीणांयद्रजोभवेत् ॥१९९॥


ऋतु के समय (रज के दीखने) वाद १६ सोलह दिन के भीतर स्त्री का संग करै और फिर रजके समय शुद्ध हो जाती है धोबी चमार नट बुरट (जो बांस की डलियां बनाते हैं) ॥१९५॥ धीमर मेदे,कत्ताल भील ये सात अंत्यज कहे हैं इन जातियों की स्त्री को भोगकर और इन जातियों में भोजन करके और इन से प्रतिग्रह ( दान ) को लेकर ॥ १९६ ॥ यदि जान बूझ कर पूर्वोक्त तीनों कर्म किये हों तो एक वर्ष तक कृच्छ्र और अज्ञान से दो कृच्छ्र व्रत करे–जो स्त्री म्लेच्छ पापकर्मियों ने एक बार भोगी हो ॥ १९७ ॥ वह प्राजापत्यव्रत से और ऋतु ( मासिक धर्म ) के होने से शुद्ध होती है, यदि बल से पकड़ली हो अथवा स्वयं चली गई हो अथवा किसी के कहने से गई हो ॥१९८॥

वि० (१९९) यहां से सिद्ध है कि पूर्वकाल में स्त्रियां तपस्विनी भी होती थीं वे ही ब्रह्मवादिनी कहाती थीं । इस कारण प्राचीन स्त्री पुरुषों की बराबरी वर्त्तमान के स्त्री पुरुष नहीं कर सकते । सुवर्ण मणि आदि में मैला लगजाय तो वह फेंकने लायक नहीं होता । परन्तु रोटी आदि पकाया अन्न मैले के संसर्ग से अति दूषित हो जाता है वैसे ही पहिले स्त्री पुरुष जिन दोषों से पतित नहीं होते थे । उन्हीं दोषों से अब के नर नारी पतित होजाते हैं ॥

३६ भाषार्थसहिता-

नतेनतद्व्रतंतासां विनश्यतिकदाचन । मद्यसंस्पृष्टकुम्भेषु यत्तोयं पिवतिद्विजः ॥२००॥ कृच्छ्रपादेनशुद्ध्येत पुनःसंस्कारमर्हति । अन्त्यजस्यतुयेवृक्षा-बहुपुष्पफलोपगाः ॥२०१॥ उपभोग्यास्तुतेसर्वे पुष्पेषुचफलेषुच । चाण्डालेनतुसंस्पृष्टं यत्तोयं पिवतिद्विजः ॥२०२॥ कृच्छ्रपादेनशुद्ध्येत आपस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः । श्लेष्मौपानहविण्मूत्र स्त्रीरजोमद्यमेवच ॥२०३॥ एभिःसंदूषितेकूपे तोयंपीत्वाकथंविधिः । एकंद्व्यहंत्र्यहंचैव द्विजातीनांविशोधनम् ॥२०४॥ प्रायश्चित्तंपुनश्चैव नक्तंशूद्रस्यदापयेत् । सद्योवांतेसचैलंतु विप्रस्तुस्नानमाचरेत् ॥२०५॥


और एक बार ही भोगी हो तो प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध होती है—जिन स्त्रियों ने बहुत दिनों तक तप (व्रत) प्रारम्भ किया हो और उसी बीच में जो मासिक धर्म हो जाय तो उस से उन स्त्रियों का वह व्रत कदाचित् भी नष्ट नहीं होता—मदिरा का स्पर्श जिस में हुआ हो ऐसे घड़े के जल को जो द्विज पीले ॥२००॥ तो चौथाई कृच्छ्र करने से शुद्ध होता है और फिर उपनयन के योग्य होता है—अन्त्यजों के जो वृक्ष हों और उन पर बहुत फल पुष्प आते हों॥२०१॥ उन वृक्षों के पुष्प और फलों के भोगने में दोष नहीं है—चांडाल के स्पर्श किये हुए जल को जो द्विज पीता है ॥२०२॥ वह चौथाई कृच्छ्र से शुद्ध होता है यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है । थूके हुए कफ—जूता—विष्ठा—मूत्र—स्त्रीका रज—और मदिरा ॥२०३॥ इन से भ्रष्ट हुए कूप के जल को पीके कैसे विधि करे, ब्राह्मण एक दिन क्षत्री दो दिन, वैश्य तीन दिन व्रत करने से शुद्ध होते हैं ॥२०४॥ और फिर प्रायश्चित्त यह है कि शूद्र नक्त (रात्रि ही को भोजन) करे और उसी समय वमन कर दियाहोतो ब्राह्मण सचैल स्नानकरे॥२०५॥