भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिसृतिः ॥ २५

शंकरस्यापिविष्णोर्वा प्रयातिपरमंपदम् । जीवद्भर्तरिवामाङ्गी मृतेवापिसुदक्षिणे ॥ १३६ ॥ श्राद्धे यज्ञेविवाहेच पत्नीदक्षिणतःसदा । सोमःशौचंददौतासां गंधर्वाश्चतथाऽगिराः ॥ १३७ ॥ पावकःसर्वमेध्यंच मेध्यंवैयोषितांसदा । जन्मनाब्राह्मणोज्ञेयः संस्कारैर्द्विजउच्यते ॥१३८॥ विद्ययायातिविप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेवच । वेदशास्त्राण्यधीत्यैयः शास्त्रार्थंचनियोधयेत् ॥१३९॥ तदासौवेदविद्रोक्तो वचनंतस्यपावनम् । एकोऽपिवेदविद्धर्मं यंव्यवस्येद्द्विजोत्तमः ॥१४०॥ सज्ञेयःपरमोधर्मो नाज्ञानामयुतायुतैः । पावकाइवदीप्यन्ते जपहोमैर्द्विजोत्तमाः ॥१४१॥


भावार्थ—तथा शिव विष्णु की प्रतिमा के चरणोदक को श्रद्धा से पीवे तो भी वह परम पद नाम मोक्ष को प्राप्त होती है—पतिके जीते हुए स्त्री वाम अंग में स्थित होती है और पति के मरे पीछे दक्षिण अंग में ॥ १३६ ॥ श्राद्ध-य-ज्ञ और विवाह में सदा पत्नी दक्षिण की ओर बैठती है चन्द्रमा गन्धर्व और अंगिरा ( बृहस्पति ) ने उन स्त्रियों को शौच ( शुद्धता ) दियो है ॥१३७॥ और अग्नि ने सब अंगों को पवित्रता दी है इसी से स्त्रियों को सदा पवि-त्रता है—जन्मसे ब्राह्मण संज्ञा होती है—औरसंस्कारों से द्विज कहाताहै ॥१३८॥ विद्या के पढ़ने से विप्रत्व को प्राप्त होता तथा जन्म, यज्ञोपवीत, और वेद विद्या से श्रोत्रिय संज्ञा होती है जो वेद और शास्त्र को पढ़े और शास्त्र के अर्थ को बतावे ॥ १३९ ॥ उस ब्राह्मण को वेदवित् कहते हैं उस का वचन प-वित्र करने वाला है एक भी वेद का जानने वाला ब्राह्मण जिस धर्म का निर्णय करदे ॥ १४० ॥ वही परम धर्म जानना चाहिये तथा मूर्खों के दश सहस्रों के दश सहस्र भी मिलके कहें वह धर्म नहीं जानना चाहिये—जप और होम करने से ब्राह्मण लोग अग्नि के समान तेजस्वी होते हैं ॥१४१॥