अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ भाषार्थसहिता
अनादिष्टेषुपापेषु चान्द्रायणमथोदितम् ।
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टैर्द्विगुणदक्षिणैः ॥ १३० ॥
यत्फलंसमवाप्नोति तथाकृच्छ्रैस्तपोधनाः ।
वेदाभ्यासरतःक्षान्तो नित्यंशास्त्राण्यवेक्षयेत् ॥ १३१ ॥
शौचमृद्वार्यभिरतो गृहस्थोपिहिमुच्यते ।
उक्तमेतद्विजातीनां महर्षेब्रूयतामिति ॥ १३२ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि स्त्रीशूद्रपतनानिच ।
जपस्तपस्तीर्थयात्रा प्रव्रज्यामन्त्रसाधनम् ॥ १३३ ॥
देवताराधनंचैव स्त्रीशूद्रपतनानिषट् ।
जीवद्भर्त्तरियानारी उपोष्यव्रतचारिणी ॥ १३४ ॥
आयुष्यंहरतेभर्तुः सानारीनरकंव्रजेत् ।
तीर्थस्नानार्थिनी नारी पतिपादोदकंपिबेत् ॥ १३५ ॥
अनादिष्टपापों (जिन का शास्त्र में प्रायश्चित नहीं है) की शुद्धि में चांद्रायण कहा है—दुगुणा दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि यज्ञों के करने से ॥ १३० ॥ जिस फलों को प्राप्त होता है उन्हीं फलों को कृच्छ्रों के करने से हे तपस्वियो ! मनुष्य प्राप्त होता है और वेद के पढ़ने में तत्पर दुर्घम और नित्य शास्त्र के देखने वाले को भी वही फल मिलता है ॥ १३१ ॥ जो गृहस्थी शुद्ध मिट्टी और जल से शौच करता है वह पापों से मुक्त हो जाता है हे महर्षियो ! तुम सुनो यह द्विजातियों का धर्म कहा है ॥ १३२ ॥ इस से आगे स्त्री और शूद्रों के पतित होने के कारणों को कहेंगे जप—तप—तीर्थों की यात्रा—संन्यास मंत्र की सिद्धि करना ॥ १३३ ॥ और देवताओं की आराधना ये छः कर्म स्त्री और शूद्रों के पतन के हेतु हैं जो स्त्री पति के जीते हुए उपवास व्रत करती है ॥ १३४ ॥ वह अपने पति की अवस्था को न्यून करती है और स्वयं नरक को जाती है यदि स्त्री को तीर्थ के स्नान की इच्छा हो तो अपने पति के चरणों को धोकर पीवे ॥ १३५ ॥