अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ भाषार्थसहिता ॥
प्रतिग्रहेणनश्यन्ति वारिणेवावपावकः । तान्प्रतिग्रहजान्दोषान्-प्राणायामैर्द्विजोत्तमाः ॥१४२॥ नाशयन्तिहि विद्वांसो वायुर्मेघानिवाम्बरे । भुक्तमात्रोयदाविप्र आर्द्रपाणिस्तुतिष्ठति ॥१४३॥ लक्ष्मीर्बलंयशस्तेज आयुश्चैवप्रहीयते । यस्तुभोजनशालाया-मासनस्थउपस्पृशेत् ॥१४४॥ तच्चान्नंनैवभोक्तव्यं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् । पात्रोपरिस्थितेपात्रे यस्तुरुत्थाप्यउपस्पृशेत् ॥१४५॥ तस्यान्नंनैवभोक्तव्यं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् । नदेवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवतिनिष्फलम् ॥१४६॥ हस्तंप्रक्षालयित्वायः पिवेद्भुक्त्वा द्विजोत्तमः । तदन्नमसुरैर्भुक्तं निराशाःपितरोगताः ॥ १४७ ॥
भा० प्रतिग्रह लेने से ब्राह्मण ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे जल से अग्नि, उन प्रतिग्रह से उत्पन्न हुए दोषों को ब्राह्मण लोग प्राणायामों से ॥१४२॥ ऐसे नष्ट करते हैं जैसे आकाश में मेघों को वायु-जो ब्राह्मण भोजन करने के अनन्तर आर्द्र (गीले) हाथ रक्खे ॥१४३॥ तो लक्ष्मी-बल-यश-तेज-और अवस्था ये पांचों उस के नष्ट हो जाते हैं। जो भोजन के स्थान में आसन पर स्थित हुआ भोजन करते समय अन्न को छुवे ॥१४४॥ तो उस अन्न को फिर स्वयं वा अन्य न खाये और खाय तो चान्द्रायण व्रत करे-पात्र के ऊपर रक्खे हुए पात्र का जो स्पर्श करे ॥१४५॥ तो उस पात्र के अन्न को भी भक्षण न करे और भक्षण करले तो चान्द्रायण व्रत करे, न तो उस के देवता तृप्त होते और दाता का दिया दान भी निष्फल होता है ॥१४६। हे ऋषि लोगो ! जो पुरुष भोजन करके पश्चात् हाथों को धोकर उसी जल को पीता है उन के श्राद्ध के अन्न को मानो राक्षसों ने खाया और पितर निराश गये ॥ १४७ ॥