अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअङ्गिरस्स्मृतिः ॥ २७
नास्तिवेदात्परंशास्त्रं नास्तिमातुःपरोगुरुः । नास्तिदानात्परंमित्र-मिहलोकेपरत्रच ॥ १४८ ॥ अपात्रेष्वपियद्दत्तं दहत्यासप्तमंकुलम् । हव्यंदेवानगृह्णन्ति कव्यंचपितरस्तथा ॥ १४९ ॥ आयसेनतुपात्रेण यदन्नमुपदीयते । श्वानविष्ठासमंभुङ्क्ते दाताचनरकंव्रजेत् ॥१५०॥ पित्तलेनतुपात्रेण दीयमानंविचक्षणः । नदद्याद्वामहस्तेन आयसेनकदाचन ॥ १५१ ॥ मृन्मयेषुचपात्रेषु यःश्राद्धेभोजयेत्पितॄन् । अन्नदाताचभोक्ताच तावेवनरकंव्रजेत् ॥ १५२ ॥ अभावेमृन्मयंदद्या-दनुज्ञातन्तुतैर्द्विजैः । तेषांवचःप्रमाणंस्याद् यदन्नंचातिरिक्तकम् ॥१५३॥
इस लोक तथा परलोक में वेद से परे शास्त्र नहीं और माता से परे माननीय गुरु नहीं है तथा इस जन्म वा जन्मान्तर में दान से परे कोई मित्र नहीं है ॥ १४८ ॥ जो दान कुपात्र को दिया है वह दान सात पीढ़ी तक कुल को दग्ध ( नष्ट ) करता है तथा कुपात्र को दिये हव्य को देवता, और कव्य को पितर ग्रहण नहीं करते हैं ॥ १४९ ॥ लोहे के पात्र से जो अन्न परसा जाता है उस अन्न को भोजन करने वाला कुत्ते की विष्ठा के तुल्य खाता है और उस अन्न का दाता नरक को जाता है १५०॥ बुद्धिमान् पुरुष पीतल और लोहे के पात्र में रखकर तथा बांये हाथ से, कदाचित् भी न देवे ॥ १५१ ॥
जो पुरुष श्राद्ध के समय मिट्टी के पात्रों में पितृ ब्राह्मणों को भोजन कराता है वह अन्न का दाता और भोक्ता दोनों नरक में जाते हैं ॥ १५२ ॥ शास्त्रोक्त पात्र के अभाव में उन ब्राह्मणों की आज्ञा से मिट्टी के पात्र में ही अन्न को परसदे और जो अन्न ब्राह्मणों के भोजन से बचे उस के लिये पितृ ब्राह्मण लोग जैसी आज्ञा दें वैसा करे क्यों कि उन का ही वचन प्रमाण है ॥ १५३ ॥