भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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२८ | भाषार्थसहिता ॥

सौवर्णायसताम्रेषु कांस्यरौप्यमयेषुच ।
भिक्षादातुर्नधर्मोस्ति भिक्षुर्भुङ्क्तेतुकिल्विषम् ॥१५४॥
नचकांस्येषुभुञ्जीया-दापद्यपिकदाचन ।
मलाशाःसर्वएवैते यतयःकांस्यभोजनाः ॥ १५५ ॥
कांस्यकस्यचयत्पात्रं गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्यभोजीयतिश्चैव प्राप्नुयात्किल्विषंतयोः ॥१५६॥
अत्राप्युदाहरन्ति
सौवर्णायसताम्रेषु कांस्यरौप्यमयेषुच ।
भुञ्जन्भिक्षुर्वैदुःष्येत दुष्येच्चैवपरिग्रहे ॥ १५७ ॥
यतिहस्तेजलंदद्या-द्भिक्षांदद्यात्पुनर्जलम् ॥
तदन्नंमेरुणांतुल्यं तज्जलंसागरोपमम् ॥ १५८ ॥
चरेन्माधुकरींवृत्ति मपिम्लेच्छकुलादपि ।


उस बचे अन्नको यदि सोने-लोहे-तांबे वा चांदीके पात्रमें भिखारी को देय तो भिक्षा के दाता का कुछ धर्म नहीं है और भिखारी पाप का भोक्ता होता है॥१५४॥
संन्यासी पुरुष आपत्ति कालमेंभी कांसीके पात्र में भोजन कदापि न करे क्योंकि जो संन्यासी कांसे के पात्र में भोजन करने वाले हैंवे संपूर्ण मल के खाने वाले हैं ॥१५५॥
जो कांसे वालेका पात्र हो और गृहस्थी का पात्र किसी धातु का हो उस में यदि संन्यासी भोजन करै तो उनदोनों के दोष को प्राप्त होता है ॥१५६॥
इस विषय में और ऋषि भी कहते हैं कि-सोने-लोहे-तांबे कांसे और चांदी के पात्रों में भोजन करता हुआ संन्यासी दूषित होता और भोग के पदार्थों का संचयऔर रक्षा करने से भी संन्यासी दूषित हो जाता है ॥ १५७ ॥
संन्यासी के हाथमें पहिले कुल्लादि के लिये जल दे फिर भिक्षा दे और फिर जल दे [अर्थात् किसी पात्रमें जल वा भिक्षा न देवे] वह अन्न मेरु तुल्य और जल समुद्रके तुल्य अनन्त फल देनेवाला होता है ॥१५८ ॥
संन्यासी पुरुष भले ही बृहस्पति के तुल्य बड़ा विद्वान् प्रविष्ट ज्ञानी हो तोभी अनेक उत्तम कुलीन ब्राह्मणादि