भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिस्मृतिः ॥ २९

एकान्नं नैवभोक्तव्यं बृहस्पतिसमोयदि ॥ १५९ ॥ अनापदिचरेद्यस्तु सिद्धं भैक्षंगृहेवसन् । दशरात्रंपिबेद्वज्र-मापस्त्रयहमेवच ॥ १६० ॥ गोमूत्रेणतुसंमिश्रं यवकंघृतपाचितम् । एतद्वज्रमितिप्रोक्तं भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ १६१ ॥ ब्रह्मचारीयतिश्चैव विद्यार्थीगुरुपोषकः । अध्वगःक्षीणवृत्तिश्च षडेतेभिक्षुकाःस्मृताः ॥ १६२ ॥ षण्मासान्कामयेन्मर्त्यो गुर्विणीमेववैस्त्रियम् । आदन्तजननादूर्ध्वं एवंधर्मोनहीयते ॥ १६३ ॥ ब्रह्महाप्रथमंचैव द्वितीयंगुरुतल्पगः । तृतीयंतुसुरापेयं चतुर्थंस्तेयमेवच ॥ १६४ ॥ आमांवस्त्रंतिलान्भूमिं गन्धंवासयतेतथा ।


के घर न मिलने पर भले ही नीच म्लेच्छों के घर से भी मधूकरा एक २ (रोटी) मांग कर खावे परन्तु किसी एक घर का भोजन कदापि न करे ॥१५९॥ जो संन्यासी आपत्काल के बिना घर में बसता हुआ सिद्ध (बनी बनाई) भिक्षा को खाता है वह दश रात्र तक वज्र को पीवे और तीन दिन केवल जल पीवे (तब शुद्ध होता है) ॥१६०॥ गो मूत्र जिसमें मिला हो ऐसे घी में पकाये जौ के चून को वज्र कहते हैं यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥१६१॥ ब्रह्मचारी,-संन्यासी,-विद्यार्थी,-भिक्षान्न से गुरु का रक्षक, मार्ग में चलने वाला-और जिसकी कोई जीविका न हो ये छः६ भिक्षुक कहाते हैं ॥ १६२ ॥ गर्भवतो स्त्री के संग छ महीने तक मनुष्य विषय करै और बालक के होने पर बालक के दांत उपजने के पश्चात् विषय करै इस प्रकार धर्म नष्ट नहीं होता है ॥ १६३ ॥ बालक के जन्म के पश्चात् प्रथम मास में ब्रह्महत्या का-दूसरे मास में गुरु की शय्या में गमन करने का, तृतीय मास में मदिरा पान का-चतुर्थ मास में चोरी करने का-दोष लगता है ॥ १६४ ॥ बिना रंगा वस्त्र-तिलकां भूमि का