भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

३७ भाषाऽर्थसहिता ॥

पापानांचैवसंसर्गः पञ्चकंपातकंमहत् ॥ १६५ ॥
एषामेवविशुद्ध्यर्थं चरेत्कृच्छ्राण्यनुक्रमात् ।
त्रीणिवर्षाण्यकामश्चेद् ब्रह्महत्यापृथक् पृथक् ॥१६६॥
अर्द्धंतुब्रह्महत्यायाः क्षत्रियेषुविधीयते ।
षड्भागोद्वादशश्चैव तथाविट्शूद्रयोर्भवेत् ॥ १६७ ॥
त्रीन्मासान्नक्तमश्नीया-द्भूमौशयनमेवच ।
स्त्रीघातीशुध्यतेऽप्येवं चरेत्कृच्छ्राब्दमेववा ॥ १६८ ॥
रजकःशैलुषश्चैव वेणुकर्मोपजीविनः ।
एतेषांयस्तुभुङ्क्ते वै द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ १६९ ॥
सर्वान्त्यजानांगमने भोजनेसंनिवेशने ।
पराकेणविशुद्धिःस्याद् भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ १७० ॥
चाण्डालभाण्डेयत्तोयं पीत्वाचैवद्विजोत्तमः ।
गोमूत्रयावकाहारः सप्तषट्त्रिंशदहान्यपि ॥ १७१ ॥


संग्रह-सुगन्ध का लगाना पापियों का मेल ये पांच बड़े पातक संन्यासी के हैं ॥ १६५ ॥ इन की ही शुद्धि के अर्थ क्रम से तीन वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करै- और यदि कृच्छ्र करने की इच्छा न हो तो पृथक् २ ब्रह्महत्या लगती है ॥१६६॥ छत्री को आधी ब्रह्महत्या, और वैश्य को छठा भाग, और शूद्र को बारहवां भाग ब्रह्महत्या का लगता है ॥ १६७ ॥ जिस ने स्त्री की हत्या की हो वह मनुष्य तीन मास तक रात्रि में ही भोजन करै, पृथवी पर सोवे अथवा एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करै इस प्रकार करने से शुद्ध होता है ॥ १६८ ॥ धोबी-नट और बांसों से जीविका करने वाले, इन के अन्न को जो द्विज भक्षण करता है वह चान्द्रायणव्रत करै ॥ १६९ ॥ सब अंत्यज स्त्रियों के साथ गमन करने उन के साथ भोजन करने और संग बैठने से पराक व्रत से शुद्धि होती है यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥ १७० ॥ जो ब्राह्मण चाण्डाल के पात्र में जल पीलेवे तो ४३ दिन तक गोमूत्र और जौ को खाकर शुद्ध होता है ॥ १७१ ॥