अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ भाषाधर्मसंहिता-
पूर्व्वस्त्रियः सुरैर्भुक्ता सोमगन्धर्व्ववह्निभिः ॥ १८० ॥
भुञ्जतेमानवाःपश्चा-न्नवाहुष्यंतिकर्हिचित् ।
असवर्णस्तुयोगर्भः स्त्रीणांयोनौ निषिच्यते ॥१८१॥
अशुद्धासाभवेन्नारी यावद्गर्भं नमुंचति ।
विमुक्ते तुततःशल्येर जश्चापिप्रदृश्यते ॥ १८२ ॥
तदास्राशुद्ध्यतेनारी विमलं कांचनंयथा ।
स्वयंविप्रतिपन्नाया यदिवाविप्रतारिता ॥ १८३ ॥
बलान्नारीप्रभुक्तावा चौरभुक्तातथापिवा ।
नत्याज्यादूषितानारी नकामोस्याविधीयते ॥१८४॥
हाग आदि) और दुर्गन्ध्यादि को जलाने से भी अग्नि दूषित नहीं होते प्रथम कन्या की दशा कुमारीपन में चन्द्रमा गन्धर्व-और अग्नि देवता स्त्रियों के पति हो चुकते हैं ॥ १८० पीछे से मनुष्य के साथ विवाह होता पर वे स्त्री दूषित नहीं होतीं-जो असवर्णा (भिन्न जाति का) गर्भ स्त्री की योनि में सींचा जाता है ॥ १८१ ॥ वह स्त्री इतने दिन तक अशुद्ध होती है कि जब तक गर्भ को न त्यागे और गर्भत्याग के के पश्चात् जो रज दीखे (मासिक-धर्म हो) ॥ १८२ ॥ तब वह स्त्री इस प्रकार शुद्ध होजाती है जैसा कि निर्मल सोना । अपने आप किसी मनुष्य के समीप जाने से संग दोष लगा हो वा कोई छल से ले गया हो ॥ १८३ ॥ अथवा बल पूर्वक वा चोर ने भोगी हो ऐसी दूषित स्त्री का त्याग न करे क्योंकि स्त्री की कामना से यह काम नहीं हुआ है ॥ १८४ ॥
स्त्रियां प्रायः मूर्ख अजान होती हैं इस से अबोधबालक के समान उन को साधारण अपराधों में त्याग नहीं देना चाहिये । (सोमः प्रथमो विविदे०) इसवेदमन्त्र का आशय यहां दिखाया गया है ।
(१८१-१८४) धर्मशास्त्रों की सब बातें सब काल के लिये नहीं होतीं इस के अनुसार प्राचीन काल में काम क्रोध लोभ स्त्री पुरुषों में बहुत कम थे और धर्म अधिक था । तथा राज प्रबन्ध भी ऐसा अब का सा नहीं था । शुद्धान्तः करण वालों को कमल के पत्ते पर जल न लगने के तुल्य दोष नहीं लगते । पर अब वैसे शुद्ध धर्मनिष्ठ स्त्री पुरुष नहीं रहे इस कारण अब अन्य जाति के गर्भ तथा व्यभिचार से स्त्री पतित हो जाती है ।