भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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अत्रिसमृतिः ॥ ३३

कामतस्तुप्रसूतोवा तत्समोनात्रसंशयः ।
सएवपुरुषस्तत्र गर्भोभूत्वाप्रजायते ॥ १८५ ॥

तैलाभ्यक्तोघृताभ्यक्तो विण्मूत्रंकुरुतेद्विजः ।
तैलाभ्यक्तोघृताभ्यक्त-श्चाण्डालंस्पृशतेद्विजः ॥१८६॥

अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ।
शशस्यास्थिजम्बूकास्थीनि नखशुक्तिकपर्द्दिकाः ॥१८७॥

होमतप्तघृतंपीत्वा तत्क्षणादेवनश्यति ।
गोकुलेकंदुशालायां तैलचक्रेक्षुयंत्रयोः ॥१८८॥

अमीमांस्यानिरीौचानि स्त्रीणांचव्याधितस्यच ।
नस्त्रीदुष्यतिजारेण ब्राह्मणोवेदकर्मणा ॥ १८६ ॥

नापोमूत्रपुरीषाभ्यां नाग्निर्दहतिर्क्रमणा ।


में पूर्वोक्त स्त्रियों के साथ संग करे तो अथवा संतान के उत्पन्न होने पर उन स्त्रियों की ही समान जाति होजाते हैं इस में संशय नहीं है क्योंकि वह पुरुष ही गर्भ रूप होकर उत्पन्न होता है ॥ १८५ ॥ जो द्विज तेल अथवा घृत से उबटना करके शौच को जाता अथवा लघुशंका करता है वा चांडाल का स्पर्श करता है ॥१८६॥ वह एक दिन रात उपवासकर के पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है कछुआ और-गीदड़ की हड्डी नख, गीली सीपी-और कौड़ी इनके स्पर्शमे जो दोष लगता है । १८७। वह होम के उष्ण घी के पीने से उसी क्षण नष्ट हो जाता है । गौओं के झुंड-कंदुशाला ( भाड़ ) में-तेल निकालने के ( कोल्हू ) में और गन्ने के यंत्र ( कोल्हू ) में । १८८ । स्त्रियां और रोग की अवस्था में शुद्धता का विचार नहीं करना अर्थात् ये सब सर्वदा शुद्ध ही हैं स्त्री जार से [ अर्थात् मन के चञ्चलायमान होने मात्र से स्त्री ऐसी दूषित नहीं होती जो त्याग दी जावे । सो मनु जी ने लिखा है कि-( रजसास्त्रीमनोदुष्टा ) कि चाहीय दूषित भी जावे ] और ब्राह्मण वेदोक्त कर्म [ लोक विरुद्ध ] करने पर भी दूषित नहीं होते ॥ १८६ ॥ मूत्र और विष्ठा के पड़ने से जल ( नदी क्षीरोद न-

( १८८ । १८९ ) यदि स्त्री को दोष न लगे तो पतिव्रता की महिमा वा प्रशंसा भी व्यर्थ हो जावे। इस कारण इन श्लोकों का अभिप्राय यह है कि

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