भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३२भाषाधर्मसंहिता ।

अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १७८ ॥
एकशाखासमारूढ - श्चाण्डालोब्राह्मणोयदा ।
फलान्यत्तिस्थितस्तत्र प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १७९ ॥
त्रिरात्रोपोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्त्रियोम्लेच्छस्यसंपर्कान् शुद्धिःसांतपनेतथा ॥१८०॥
तप्तकृच्छ्रं पुनःकृत्वा शुद्धिरैषाविधीयते ।
संवर्तेतयथाभार्यां गत्वाम्लेच्छम्यसंगताम् ॥१८१॥
सचैलंस्नानमादाय घृतस्यप्राशनेनच ।
केशकीटनखस्नायु अस्थिकंटकमेवच ॥ १८२ ॥
स्पृष्टोनद्युदकेस्नात्वा घृतं प्राश्यविशुद्ध्यति ।
संगृहीतामपत्यार्थ - मन्यैरपितथापुनः ॥ १८३ ॥
चाण्डालम्लेच्छश्वपच कपालव्रतधारिणः ।
अकामतःस्त्रियोग वा पराकेणविशुद्ध्यति ॥१८४॥


गव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ १७८ ॥ यदि एक ही शाखा पर चढ़े हुए ब्राह्मण और चांडाल फलों को खाते हों तो ऐसी दशा में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १७९॥ ब्राह्मण तीन दिन तक उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है और म्लेच्छ की स्त्री के साथ संग करने पर सांतपन कृच्छ्र व्रत करने से शुद्धि होती है ॥१८०॥ फिर तप्त कृच्छ्र करे यह शुद्धि शास्त्रों में कही है-यदि किसी की स्त्री को कोई म्लेच्छ ले गया मात्र हो किन्तु दूषित न किया हो तो उस स्त्री के पास जाके उसे लाकर ऐसा बर्ताव करे कि ॥ १८१ ॥ वस्त्रों सहित स्नान कराके केवल घृत खिलावे तथा केश कीट-नख-स्नायु-अस्थि ( हाड़ ) कांटे ॥ १८२ ॥ इन का स्पर्शकरावे तथानदी के जलमें स्नान और घृत को भक्षण करानेसे शुद्ध होती है-तथा संतानोत्पत्ति के लिये अन्य किसी मनुष्य ने पकड़ी मात्र स्त्री का भी यही उक्त प्रायश्चित्त कराना चाहिये ॥ १८३ ॥ चांडाल-म्लेच्छ-श्वपच कपाल व्रत के धारण करने वाले ( अघोरी ) इनकी स्त्रियों के साथ इच्छा के बिना संग करके पराक व्रत से विशेष कर शुद्धि होती है ॥ १८४ ॥