अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥
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एकैकंग्रासमश्नीयात् त्र्यहानित्रीणिपूर्ववत् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीया-दतिकृच्छ्रं तदुच्यते ॥ १११ ॥
इत्येतत्कथितंपूर्वै-र्महापातकनाशनम् ।
वेदाभ्यासरतंक्षान्तं महायज्ञक्रियापरम् ॥ ११२ ॥
नस्पृशन्तीहपापानि महापातकजान्यपि ।
वायुभक्षोदिवातिष्ठे-द्रात्रीन्नीत्वाप्सुसूर्यदृक् ॥११३॥
जप्त्वासहस्रंगायत्र्याः शुद्धिस्त्र्यह्वयधाहते ।
पद्मोदुंबरबिल्वान्न कुशाश्वत्थपलाशकाः ॥ ११४ ॥
एतेषामुदकंपीत्वा पर्णकृच्छ्रं तदुच्यते ।
पंचगव्यंचगोक्षीरंदधिमूत्रंशकृद्घृतम् । ११५ ॥
जग्ध्वापरंन्ह्युपवसे-त्कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ।
पृथक्सांतपनैर्द्रव्यैः षडहःसोपवासकः ॥११६॥
प्रथम तीन दिन तक एक २ ग्रास का भोजन करै और अगले तीन दिन में सर्वथा भोजन न करै इस को अतिकृच्छ्र व्रत कहते हैं ॥ १११ ॥ वेदों के अभ्यास में तत्पर तथा कृश और पांच महायज्ञों के करने में रत के लिये पूर्वज ऋषियों ने महापातक के नाश करने वाला यह प्रायश्चित्त कहा है ॥११२॥ जो दिन में सूर्य को देखता हुआ वायु को खाकर रहे और रात्रि को जलों में खड़ा हो व्यतीत करे उस को इस लोक में महापातक से उत्पन्न हुए पाप भी स्पर्श नहीं करते ॥ ११३ ॥ एक हजार गायत्री का जप करके ब्रह्महत्या से भिन्न सब पापों से शुद्धि होती है—कमल–गूलर–बेल–कुशा पीपल और ढाक ॥११४॥ इन के जल को पीकर दिन को व्यतीत करे उसे पर्णकृच्छ्र व्रत कहते हैं पंच गव्य ये हैं कि गौका दूध दही, मूत्र, गोबर—घी ॥ ११५ ॥ इन को प्रथम दिन खाकर अगले एक दिन उपवास करे इसे सांतपनकृच्छ्र कहते हैं—सांतपनकृच्छ्र के पञ्चगव्य तथा कुशोदक इन छः पदार्थों को क्रमशः एक २ दिन खाकर छः दिन व्यतीत करे और एक सातवें दिन उपवास करे ॥ ११६ ॥