अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ पराशरस्मृतिः ॥
गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ चाण्डालघटसंस्पृष्टं यत्तोयं पिवति द्विजः । तत्क्षणात्क्षिपतेयस्तु प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ २७ ॥ यदि न क्षिपतेतोयं शरीरेयस्यजीर्यति । प्राजापत्यं न दातव्यं कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ २८ ॥ चरेत्सांतपनं विप्रः प्राजापत्यंतुक्षत्रियः । तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादं शूद्रस्यदापयेत् ॥ २९ ॥ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु जलं दधि पयः पिबेत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैवप्रमादतः ॥ ३० ॥ ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनांतुनिष्कृतिः । शूद्रस्यचोपवासेन तथादानेनशक्तितः ॥ ३१ ॥ भुङ्क्तेऽज्ञानाद्द्विजश्रेष्ठः चाण्डालात्नंकथंचन । गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति ॥ ३२ ॥ एकैकंग्रासमश्नीयाद् गोमूत्रयावकस्यच । दशाहंनियमस्थस्य व्रतंतत्तुविनिर्दिशेत् ॥ ३३ ॥
वर्तन का स्पर्श हुआ हो उस कुए का जल पिया होतो गोमूत्र और कुलत्थ को खाकर एक दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २६ ॥ यदि चांडाल के घट का जल ब्राह्मण पीलेवे और उस जल को उसी क्षण में वमन कर दे तो एक प्राजापत्य व्रत करे ॥ २७ ॥ यदि वमन न करदे और उस जल को पचाजाय तो प्राजापत्य न करै किन्तु सांतपन कृच्छ्र व्रत करे ॥ २८ ॥ ब्राह्मण कृच्छ्र सांतपन व्रत, क्षत्रिय प्राजापत्य, वैश्य आधा प्राजापत्य और शूद्र चौथाई प्राजापत्य व्रत करे ॥ २९ ॥ यदि अन्त्यजों के पात्र में रक्खा जल, दही, दूध, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र भूल कर के पी लेवें तो ॥ ३० ॥ ब्रह्मकूर्च उपवास से द्विजातियों की और एक उपवास तथा यथाशक्ति किये दान से शूद्र की शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥ यदि किसी प्रकार अज्ञान से ब्राह्मण चांडाल के अन्न को खालेवे तो गोमूत्र और कुलत्थ को खाकर दश दिन में शुद्ध होता है ॥ ३२ ॥ और गोमूत्र में कुलत्थ को दश दिन तक एक २ ग्रास खाय और नियम से रहे यही व्रत उस ब्राह्मण के लिये बताना चाहिये ॥ ३३ ॥