अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३९
गोमयेनतुसंमिश्रैर्जलैःप्रोक्षेद्गृहंतथा ॥ ४७ ॥ ब्राह्मणस्यव्रणद्वारे पूयशोणितसंभवे । क्रमिरुत्पद्यतेयस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ ४८ ॥ गवांमूत्रपुरीषेण दध्नाक्षीरेणसर्पिषा । त्र्यहंस्नात्वाचपीत्वाच कृमिदष्टःशुचिर्भवेत् ॥ ४९ ॥ क्षत्रियोऽपिसुवर्णस्य पञ्चमाषान्प्रदायतु । गोदक्षिणांतुवैश्यस्याप्युपवासंविनिर्दिशेत् ॥ ५० ॥ शूद्राणांनोपवासः स्याच्छूद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्राह्मणांस्तुनमस्कृत्य पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५१ ॥ अच्छिद्रमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः । प्रणम्यशिरसाग्राह्यमग्निष्टोमफलंहितत् ॥ ५२ ॥ जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि । सर्वंभवतिनिश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् ॥ ५३ ॥ व्याधिव्यसननिष्क्रान्ते दुर्भिक्षेडामरेतथा ।
के पात्रों को कदापि न त्यागै और गोबर मिले जल से घर को लीपे वा छिड़के ॥ ४७ ॥ राध ( पीव ) और रुधिर से भरे ब्राह्मण के घाव में यदि कृमि ( कीड़े ) पड़ जांय तो प्रायश्चित्त कैसे हो सो कहते हैं ॥ ४८ ॥ गोमूत्र, गोबर, गोदही गोदूध गोघृत इन को मिला कर तीन दिन स्नान और इन को तीन दिन पीकर वह कीड़ों का काटा हुआ पुरुष शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥ क्षत्रिय भी पांच मासे सुवर्ण का दान देवे । वैश्य एक गौ की दक्षिणा देवे इसी उपवास से वह शुद्ध होता है ॥ ५० ॥ शूद्रों को उपवास का निषेध है इस से शूद्र दान से शुद्ध होता है । शूद्र दान देने पश्चात् ब्राह्मणों को प्रणाम कर और पञ्चगव्य का प्राशन करने से शुद्ध होता है ॥ ५१ ॥ जिस काम को ब्राह्मण लोग (अच्छिद्रमस्तु) ऐसा कह देवें । उस वाक्य को सब लोग शिरोधार्य मानकर ग्रहण करें क्योंकि उससे अग्निष्टोम यज्ञ का फल होता है ॥५२॥ जप का छिद्र तप का छिद्र और यज्ञ कर्म का छिद्र नाम जो कुछ त्रुटि है । ब्राह्मणों के कहने से यह सब छिद्र रहित हो जाता है ॥ ५३ ॥ यदि शूद्र मनुष्य व्याधियों से पीड़ित दुःखित हो, वा दुर्भिक्ष से पीड़ित हो, वा लूट लड़ाई