अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४० | पराशरस्मृतिः ॥
उपवासोव्रतोहोमो द्विजसंपादितान्निवै ॥ ५४ ॥
अथवाब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वेकुर्वन्त्यनुग्रहम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति द्विजैःसंवर्धिताशिषा ॥५५॥
दुर्बलानुग्रहःप्रोक्तस्तथावैबालवृद्धयोः ।
ततोऽन्यथाभवेद्दोषस्तस्मान्नानुग्रहःस्मृतः ॥ ५६
स्नेहाद्वायदिवालोभाद्भयादज्ञानतोऽपिवा ।
कुर्वन्त्यनुग्रहंयेतु तत्पापंतॆषुगच्छति ॥ ५७ ॥
शरीरस्यात्ययेप्राप्ते वदन्तिनियमंतुये ।
महत्कार्योपरोधेन नस्वस्थस्यकदाचन ॥ ५८ ॥
स्वस्थस्यमूढाःकुर्वन्ति नियमंतुवदन्तिये ।
तेतस्यविघ्नकर्तारः पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ ५९ ॥
स्वयमेवव्रतंकृत्वा ब्राह्मणंयोऽवमन्यते ।
वृथातस्योपवासःस्यान्नसपुण्येनयुज्यते ॥ ६० ॥
आदि से दुःखित हो तो उपवास, व्रत, और होम सुपात्र ब्राह्मण द्वारा करावे ॥ ५४ ॥ अथवा प्रसन्न संतुष्ट हुए सब ब्राह्मण लोग अनुग्रह (कृपा) करते हैं । अर्थात् ब्राह्मणों के आशीर्वाद से बढ़ा हुआ वह शूद्र सब कामनाओं को प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥ निर्बल (असमर्थ) बालक, और वृद्ध इन पर अनुग्रह करना चाहिये । यदि इन से भिन्न मनुष्यों पर अनुग्रह किया जाय अर्थात् प्रायश्चित्त न कराया जाय तो ठीक नहीं है ॥ ५६ ॥ उसको अनुग्रह नहीं कहते जो स्नेह से, भय से, लोभ से, अथवा अज्ञान से, ब्राह्मण लोग किसी पर अनुग्रह करते हैं तो अपराधी का पाप उन को ही लगता है ॥५७॥ जो ब्राह्मण लोग प्राण नाश की सम्भावना होने पर भी प्रायश्चित्त का विधान करते, और बड़े महान् कामों की हानि होने के विचार से स्वस्थ पुरुष को नियम पालन का निषेध करते हैं ॥५८॥ तथा जो मूढ़लोग स्वस्थ पुरुष के पालनीयनियम को लोभादि से स्वयं पालन करते वा कहते हैं । वे सब उस के कार्य में विघ्न करने वाले होने से अपवित्र नरक में पड़ते हैं ॥५९॥ जो पुरुष विद्वानों से पूछे बिना आपही व्रत करके ब्राह्मणों का तिरस्कार करता है। उस का उपवास वृथा है और उसे पुण्य फल प्राप्त नहीं होता ॥६०॥