अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ४९
सएवनियमोग्राह्यो यमेकोऽपिवदेद्विजः । कुर्याद्वाक्यंद्विजानांतु अन्यथाभ्रूणहाभवेत् ॥ ६१ ॥ ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं तीर्थभूताहिसाधवः । तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ६२॥ ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः । सर्वदेवमयोविप्रो नतद्वचनमन्यथा ॥ ६३ ॥ उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थंजपस्तपः । विप्रैःसंपादितंयस्य संपूर्णंतस्यतद्भवेत् ॥६४ ॥ अन्नाद्येकीटसंयुक्ते मक्षिकाकेशदूषिते । तदन्तरास्पृशेच्चापस्तदन्नंभस्मनास्पृशेत् ॥ ६५ ॥ भुञ्जानश्चैवयोविप्रः पादंहस्तेनसंस्पृशेत् । समुच्छिष्टमसौभुङ्क्ते योभुङ्क्तेभुक्तभाजने ॥ ६६ ॥ पादुकास्थोनभुञ्जीत पर्यङ्कस्थःस्थितोऽपिवा।
इससे वही नियम ग्रहण करना योग्य है जिसे एक भी ब्राह्मण कहे । और ब्राह्मण के वचन को अवश्य स्वीकार करे यदि न करेगा तो भ्रूणहत्या का दोष लगता है ॥ ६१ ॥ क्योंकि ब्राह्मण लोग जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं और साधु ( सीधे शुद्ध निर्विकार ब्राह्मण लोग ) भी तीर्थ रूप ही होते हैं । उन ब्राह्मणों के वाक्य रूप जल से ही मलिन पुरुष शुद्ध हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ ब्राह्मण लोग जिन धर्मयुक्त वाक्यों को कहते हैं उन्हें देवता भी मानते हैं । ब्राह्मण सर्व देवताओं का रूप है इस से उस का वचन अन्यथा नहीं हो सकता ॥ ६३ ॥ उपवास व्रत स्नान जप तप ये सब जिस के ब्राह्मण ने संपादन ( अनुमोदन ) कर दिये उस को ही इन का ठीक फल होता है ॥ ६४॥ यदि पकाये हुये अन्न में कीड़े मिल गये हों वा वह भोज्यान्न मक्खी और केशों से दूषित हो गया हो तो कीड़ा, मक्खी केशादि को निकाल के उस के बीच २ जल से धो कर शुद्ध करे और उस अन्न का भस्म से स्पर्श करे ॥६५॥ जो भोजन करता हुआ ब्राह्मण पग को दहिने हाथ से छूलेवे तो अथवा किसी के जूठे पात्र में भोजन करे तो उस का उच्छिष्ट भोजन करना जानो ॥ ६६ ॥
खड़ागू पर बैठ कर वा खाट अथवा बिस्तरे पर बैठ कर अथवा खड़ा हो कर
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