भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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४२ | पराशरस्मृतिः ॥

चाण्डालेनशुनादृष्टं भोजनंपरिवर्जयेत् ॥६७॥
पक्वान्नंप्रतिषिद्धंस्यादन्नशुद्धिस्तथैवच ।
यथापराशरेणोक्तं तथैवाहंवदामिवः ॥ ६८ ॥
मितंद्रोणाढकस्यान्नं काकश्वानोपघातितम् ।
केनेदंशुद्ध्यतेचेति ब्राह्मणेभ्योवेदयेत् ॥ ६९ ॥
काकश्वानावलीढंतु द्रोणान्नंपरित्यजेत् ।
वेदवेदाङ्गविद्वद्भिर्धर्मशास्त्रानुपालकैः ॥ ७० ॥
प्रस्थाद्द्वात्रिंशतिर्द्रोणः स्मृतोद्विप्रस्थआढकः ।
ततोद्रोणाढकस्यान्नं श्रुतिस्मृतिविदोविदुः ॥ ७१ ॥
काकश्वानावलीढंतु गवांघ्रातं खरेणवा ।
स्वल्पमन्नंत्यजेद्विप्रः शुद्धिर्द्रोणाढकेभवेत् ॥ ७२ ॥
अन्नस्योद्धृत्यतन्मात्रं यच्चलालाहतंभवेत् ।
सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य हुताशेनैवतापयेत् ॥ ७३ ॥
हुताशनेनसंस्पृष्टं सुवर्णसलिलेनच ।


भोजन न करे। कुत्ते और चांडाल के देखे हुये भोजन को त्याग देवे ॥६७॥ पका-
या हुआ कोई अन्न निषिद्ध है वा किसी अन्न की शुद्धि हो सकती है। व्यास
जी कहते हैं कि इस उक्त विषय में महर्षि पराशर ने जैसा विचार कहा वैसा
हम कहते हैं ॥६८॥ द्रोण वा आढक भर पकाये अन्न को यदि कौआ वा कुत्ता
बिगाड़ देवे तो यह अन्न कैसे शुद्ध हो ऐसा ब्राह्मणों से कहे ॥६९॥ उस समय
धर्मशास्त्र की मर्यादा के रक्षक और वेद वेदाङ्ग के जानने वाले ब्राह्मण लोग
यह आज्ञा देवें कि काक वा कुत्ते ने बिगाड़े द्रोण भर अन्न को न त्यागे
॥ ७० ॥ बत्तीस प्रस्थ (अंजली) का एक द्रोण और दो प्रस्थ का एक आढक
कहाता है। तिस से श्रुति स्मृति के ज्ञाता विद्वान् लोग द्रोणान्न तथा आढ-
कान्न को शुद्ध मानते हैं ॥ ७१ ॥ यदि कौआ वा कुत्ता ने चाटा और गौ वा
गधे ने सूंघा थोड़ा अन्न हो तो त्याग देवे और वह पकाया अन्न द्रोण वा
आढक भर होतो उस की शुद्धि हो सकती है ॥ ७२ ॥ जितने अन्न में कौवे
आदि का मुख लगा हो उतना निकाल देने बाद सुवर्ण के जल से छिड़क कर
अग्नि से तपावे तब शुद्ध हो जाता है ॥ ७३ ॥ क्योंकि जिस अन्न में अग्नि का