भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ४३

विप्राणांब्रह्मघोषेण भोज्यंभवतितत्क्षणात् ॥ ७४ ॥ स्नेहोवागोरसोवाऽपि तत्रशुद्धिःकथंभवेत् । अल्पंपरित्यजेत्तत्र स्नेहस्योत्पवनेनच ॥ अनलज्वालयाशुद्धिर्गोरसस्यविधीयते ॥ ७५ ॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ अथातोद्रव्यशुद्धिस्तु पराशरवचोयथा । दारवाणांतुपात्राणां तत्क्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ १ ॥ मार्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिनायज्ञकर्मणि । चमसानांग्रहाणांच शुद्धिःप्रक्षालनेनच ॥ २ ॥ चरूणांस्रुक्स्रुवाणांच शुद्धिरुष्णेनवारिणा । भस्मनाशुद्ध्यतेकांस्यं ताम्रमम्लेनशुद्ध्यति ॥ ३ ॥ रजसाशुद्ध्यतेनारी विकलंयानगच्छति । नदीवेगेनशुद्ध्येत लेपोयदिनदृश्यते ॥ ४ ॥


और सुवर्ण के जल का स्पर्श होता है उससे तथा ब्राह्मणों के वेद पाठ की ध्वनि से वह अन्न उसी समय खाने योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ ७४ ॥ यदि स्नेह ( घी आदि ) हो वा गोरस ( दूध आदि ) होय तो उस की शुद्धि कैसे हो ? उस में से थोड़ा सा निकाल देवे और घी आदि स्नेह को छान लेवे और दूध को अग्नि की ज्वाला से तपा लेने से शुद्धि कही है ॥ ७५॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥

अब महर्षि पराशर भगवान् के वचनानुसार द्रव्य की शुद्धि कहते हैं। काठ के पात्रों की तो उसी समय शुद्धि करनी इष्ट है ॥ १ ॥ यज्ञ कर्म में यज्ञ के पात्रों की शुद्धि हाथ से मांजने से होती सोम याग के चमस और सोम ग्रहों की शुद्धि जल में धोने से होती है ॥ २ ॥ चरुस्थाली, स्रुक्, स्रुवा, इन यज्ञपात्रों की उष्णजल से, कांसे के पात्र की भस्म से और तांबे के पात्र की खटाई से मांजने पर शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ यदि स्त्री ने पर पुरुष से व्यभिचार न किया हो किन्तु केवल मन से चलायमान हुई हो तो वह रजोदर्शन (मासिक धर्म होने ) ही से शुद्ध होजाती है और यदि नदी में कहीं अधिक मलिनता संलग्न न हो तो उस की साधारण अशुद्धि प्रवाह के वेग से शुद्ध हो जाती है ॥ ४ ॥