भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 375
४४पराशरस्मृतिः ॥

वापीकूपतडागेषु दूषितेषुकथंचन ।
उद्धृत्यवैकुंभशतं पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
अष्टवर्षाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ।
दशवर्षाभवेत्कन्या ततऊर्ध्वंरजस्वला ॥ ६ ॥
प्राप्तेतुद्वादशेवर्षे यःकन्यांनप्रयच्छति ।
मासिमासिरजस्तस्याः पिबन्तिपितरःस्वयम् ॥ ७ ॥
माताचैवपिताचैव ज्येष्ठोभ्रातातथैवच ।
त्रयस्तेनरकंयान्ति दृष्ट्वाकन्यांरजस्वलाम् ॥ ८ ॥
यस्तांसमुद्वहेत्कन्यां ब्राह्मणोमदमोहितः ।
असंभाष्योह्यपाङ्क्तेयः सविप्रोवृषलीपतिः ॥ ६ ॥
यःकरोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनंद्विजः ।


बावड़ी, कूप, तालाब, यदि ये किसी प्रकार दूषित हो जांय तो उन में से सौ घड़े जल निकाल कर पंचगव्य गेरने से शुद्ध होजाते हैं ॥ ५ ॥ आठ वर्ष की कन्या को गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, और दश वर्ष की को कन्या ही कहते हैं और दश वर्ष से ऊपर रजस्वला कोटि में गिनी जाती है ॥ ६ ॥ जो मनुष्य बारह वर्ष की कन्या का विवाह नहीं करता उसके पितर महीने २ में उस लड़की के रज को पीते हैं ॥ ७ ॥ माता, पिता, और जेठा भाई ये तीनों रजस्वला कन्या को देख २ कर नरक में जाते (पाप के भागी) होते हैं ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मणादि मद से मोहित उस रजस्वला * कन्या के साथ विवाह करता है वह भी संभाषण करने और पंक्ति में बैठाने योग्य नहीं क्योंकि वह स्वधर्म से पतित स्त्री का पति है ॥ ९ ॥ जो द्विज ब्राह्मणादि पुरुष एक रात भर में जितना पाप वृषली (वेश्या) का सेवन करने से प्राप्त


* रजो दर्शन होने से पहिले विवाह करे यह सभी धर्मशास्त्रों का राय से विधिवाक्य है । यदि अच्छा वर खोजने आदि में देर लगे और कन्या रजस्वला होने लगे तो दोष पितादि को नहीं लगता यह उक्त विधि का अपवाद माना जायगा । माता पितादि नरक में जाते हैं यह उक्त विधिवाक्य का अर्थवाद है । जिस का मतलब यह है कि रजस्वला होने पर सन्तानोत्पत्ति की सम्भावना है उस में बाधा पड़ती है । इस कारण माता पितादि को अपराध लगता है । विधि से विरुद्ध करने का निन्दार्थ वाद विध्यनुकूल करने की आवश्यकता और उत्तमता दिखाने के लिये है । विधि विरुद्ध करना ही पाप है और वह नरक नाम दुःख विशेष का हेतु है ॥