अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसहिता ॥ ४५
सभैक्ष्यभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्विशुद्ध्यति ॥ १० ॥
अस्तंगतेयदासूर्ये चाण्डालंपतितंस्त्रियम् ।
सूतिकांस्पृशतेचैव कथंशुद्धिर्विधीयते ॥ ११ ॥
जातवेदंसुवर्णंच सोममार्गंविलोक्यच ।
ब्राह्मणानुगतश्चैव स्नानंकृत्वाविशुध्यति ॥ १२ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीब्राह्मणींतथा ।
तावत्तिष्ठेन्निराहारा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१३॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीक्षत्रियांतथा ।
अर्द्धकृच्छ्रंचरेत्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥ १४ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीवैश्यजांतथा ।
पादहीनंचरेत्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥ १५ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीशूद्रजांतथा ।
कृच्छ्रेणशुद्ध्यतेपूर्वा शूद्रादानेनशुद्ध्यति ॥ १६ ॥
स्नातारजस्वलायातु चतुर्थेऽहनिशुद्ध्यति ।
करता है वह भिक्षा का अन्न खाकर और जप करता हुआ तीन वर्ष तक किये प्रायश्चित्त से शुद्ध होता है ॥१०॥ यदि सूर्य के अस्त हो जाने पर चांडाल, पतित, और सूतिका स्त्री इनका स्पर्श करे तो कैसे शुद्धि कही है ? सो कहते हैं ॥११॥ अग्नि, सुवर्ण, और चन्द्रमा का मार्ग इन को देख कर और ब्राह्मणों की आज्ञा से स्नान करके शुद्ध होता है ॥ १२ ॥ यदि दो रजस्वला ब्राह्मणी परस्पर स्पर्श करें तो रजोदर्शन की समाप्ति तक निराहार रहें और तीन ही दिन प्रायश्चित्त करने से शुद्ध होती हैं ॥ १३ ॥ यदि ब्राह्मणी और क्षत्रिया रजस्वला परस्पर छूजावें तो ब्राह्मणी अर्द्ध कृच्छ्र व्रत और क्षत्रिया चौथाई कृच्छ्र व्रत प्रायश्चित्त करें ॥ १४ ॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी और वैश्या परस्पर स्पर्श करलें तो ब्राह्मणी पौन कृच्छ्र व्रत और वैश्या चौथाई कृच्छ्र व्रत करे ॥ १५ ॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी और शूद्रा परस्पर स्पर्श कर लें तो ब्राह्मणी एक कृच्छ्र से और शूद्रा स्त्री दान करने से ही शुद्ध हो जाती है ॥ १६ ॥ जो रजस्वला स्त्री स्नान करके चौथे दिन शुद्ध