अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसहिता ॥ ४९
स्त्रियोवृद्धाश्चबालाश्च नदुष्यन्तिकदाचन ॥ ३७ ॥ क्षुतेनिष्ठोवनेचैव दन्तोच्छिष्टेतथाऽनृते । पतितानांचसंभाषे दक्षिणंश्रवणंस्पृशेत् ॥ ३८ ॥ अग्निरापश्चवेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । एतेसर्वेऽपिविप्राणां श्रोत्रेतिष्ठन्तिदक्षिणे ॥ ३९ ॥ प्रभासादीनितीर्थानि गङ्गाद्याःसरितस्तथा । विप्रस्यदक्षिणेकर्णे सान्निध्यंमनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥ देशभङ्गेप्रवासेवा व्याधिषुव्यसनेष्वपि । रक्षेदेवस्वदेहादि पश्चाद्धर्मंसमाचरेत् ॥ ४१ ॥ येनकेनचधर्मेण मृदुनादारुणेनवा । उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थोधर्ममाचरेत् ॥ ४२ ॥ आपत्कालेतुसम्प्राप्ते शौचाऽचारंनचिन्तयेत् । शुद्धिंसमुद्धरेत्पश्चात्स्वस्थोधर्मंसमाचरेत् ॥ ४३ ॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गवांबन्धनयोक्त्रेतु भवेन्मृत्युरकामतः ।
के अंग से उड़ी हुई धूल, (रजस्वला होने से भिन्न) स्त्रियां, बालक, वृद्ध, ये स्नानादि किये बिना भी कभी दूषित नहीं होते ॥ ३७ ॥ छींकने, थूकने, दांतों में जूठन निकलने, झूठ बोलने, और पतितों के संग बोलने पर दहिने कान का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥ अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य, और वायु, ये सब देवता ब्राह्मण के दहिने कान में निवास करते हैं ॥ ३९ ॥ प्रभासक्षेत्र आदि तीर्थ और गंगा आदि नदी, ये सब ब्राह्मण के दहिने कान में वास करते हैं यह मनु जी ने कहा है ॥ ४० ॥ देश में गदर होने, परदेश गमन, रोग, तथा व्यसन विपत्तियों के समय में अपने शरीरादि की रक्षा करे और पीछे स्वस्थ दशा होने पर धर्म का आचार विचार कर लेवे ॥४१॥ कोमल वा कठोर जिस किसी धर्म से अपनी असमर्थ दीन दशा का उद्धार करे और समर्थ होजाने पर फिर धर्म करै ॥ ४२ ॥ आपत्काल आ जाने पर शौच तथा आचार के बिगड़ने की चिन्ता न करै । पीछे स्वस्थ दशा प्राप्त होने पर शुद्धि और धर्म का आचारण कर लेवे ॥४३॥
यह पाराशरीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥
यदि अज्ञान से बांधने वा जोड़ने से गौओं की मृत्यु हो जाय तो
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