भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

५२ पराशरस्मृतिः ॥

प्रमाणमार्गंमार्गन्तो येधर्मंप्रवदन्तिवै । तेषामुद्विजतेपापं संभूतगुणवादिनाम् ॥ १६ ॥ यथाश्मनिस्थितंतोयं मारुतार्केणशुद्ध्यति । एवं परिषदादेशान्नाशयेत्तद्गदुष्कृतम् ॥ १७ ॥ नैवगच्छतिकर्त्तारं नैवगच्छतिपर्षदम् । मारुतार्कादिसंयोगात्पापंनश्यतितोयवत् ॥ १८ ॥ चत्वारोवात्रयोवापि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानांसमर्थाये परिषत्साविधीयते ॥ १९ ॥ अनाहिताग्नयोयेऽन्ये वेदवेदाङ्गपारगाः । पञ्चत्रयोवाधर्मज्ञाः परिषत्साऽपिकीर्त्तिता ॥ २० ॥ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानांयज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषुस्नातानामेकोऽपिपरिषदद्भवेत् ॥ २१॥ पञ्चपूर्वंमयाप्रोक्तास्तेषांचासंभवेत्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टाये परिषत्साऽपिकीर्त्तिता ॥ २२ ॥


प्रमाण के मार्ग को खोजते हुये जो पण्डित लोग धर्म की व्यवस्था कहते हैं उन सत्य कहने वालों से पाप डरता कांपता है ॥ १६ ॥ जैसे पत्थर पर पड़ा जल पवन और सूर्य के तेज से शुद्ध होजाता है। ऐसे ही धर्मसभा की आज्ञा से किये प्रायश्चित्त से उस पापी का पाप भी नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥ वह पाप न तो करने वाले पर रहता और न सभा पर जाता किन्तु पवन और सूर्य के संयोग से पत्थर पर पड़े जल के समान नष्ट हो जाता है ॥१८॥ वेद के ज्ञाता अग्निहोत्री चार वा तीन जो ब्राह्मणों में शास्त्र जानने में समर्थ हों उसे परिषत् कहते हैं ॥१९॥ अथवा जो अग्निहोत्री नहीं किन्तु वेद वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाले और धर्म के मर्म को जानने वाले हों ऐसे पांच वा तीन को भी परिषत् (धर्मसभा) कह सकते हैं ॥ २० ॥ कुछ न बोलने वाले मौनव्रती वा अत्यल्पमितभाषी तपस्वी मुनि आत्मविद्या (वेदान्त) के ज्ञाता, द्विजों को यज्ञ कराने वाले, और वेदोक्त नियमों को ब्रह्मचर्य्यद्वारा समाप्त करके जिनने समावर्त्तन किया हो, ऐसे ब्राह्मणों में से कोई एक भी हो तो उसे परिषत् (धर्मसभा) कह सकते हैं ॥ ॥ २१ ॥ हमने जो पहिले पांच सभ्य कहे हैं यदि वे पांचो न मिलें तो अपनी वृत्ति (जीविका) करने से सन्तोषी तीन भी पण्डित परिषत् (धर्मसभा) कहाते हैं ॥२२॥