भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ५३

अतऊर्ध्वंतुयेविप्राः केवलंनामधारकाः । परिषत्त्वंनतेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥ २३ ॥ यथाकाष्ठमयो हस्ती यथाचर्ममयोमृगः । ब्राह्मणास्त्वनधीयानास्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ २४ ॥ ग्रामस्थानंयथाशून्यं यथाकूपस्तुनिर्जलः । यथाहुतमनग्नौच अमन्त्रोब्राह्मणस्तथा ॥२५॥ यथाषण्ढोऽफलःस्त्रीषु यथागौरूपराऽफला । यथाचाज्ञेफलं दानं तथाविप्रोऽनृचोऽफलः ॥ २६ ॥ चित्रंकर्मयथानेकैरङ्गैरुन्मील्यतेशनैः । ब्राह्मण्यमपितद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपूर्वकैः ॥ २७ ॥ प्रायश्चित्तंप्रयच्छन्ति येद्विजानामधारकाः । तेद्विजाःपापकर्माणः समेतानरकंययुः ॥ २८ ॥ येपठन्तिद्विजावेदं पञ्चयज्ञरताश्चये । त्रैलोक्यंतारयन्त्येव पञ्चेन्द्रियरताअपि ॥ २९ ॥ संप्रणीतःश्मशानेषु दीप्तोऽग्निःसर्वभक्षकः ।

इन से भिन्न जो ब्राह्मण केवल नाम के धारण करने वाले हैं वे चाहें हजार गुणे भी हों तो उन की धर्मसभा नहीं होती ॥ २३ ॥ जैसे काठ का हाथी जैसे चाम का हिरण हिरण नहीं वैसे ही वेद के बिना पढ़े ब्राह्मण हैं ये तीनों नाम के ही धारण करने वाले हैं ॥ २४ ॥ जैसा निर्जन (जिस में कोई मनुष्य न हो वह) ग्राम, जैसा जल के विना कूप (अंधौआ) जैसा अग्नि विना भस्मादि में होम करना है ऐसा ही वेद मन्त्रों को पढ़े विना ब्राह्मण भी शून्य मात्र है ॥ २५ ॥ जैसे स्त्रियों में नपुंसक वृथा है जैसे बंध्या गौ वृथा है और जैसे मूर्ख ब्राह्मण को दान देना वृथा है ऐसे ही वेद हीन ब्राह्मण वृथा है ॥ २६ ॥ जैसे चित्र खींचने वालों की चित्रकारी अनेक रंगों से शनैः २ अति शोभायमान चमकीली होती है इसी प्रकार मंत्रों के द्वारा हुए अनेक संस्कारों से ब्राह्मणपन भी उज्ज्वल प्रकाशमान होता है ॥२७॥ जो विद्या और तप से हीन नामधारी ब्राह्मण प्रायश्चित्त देतेहैं वे सब पापों के कर्त्ता इकट्ठे होकर नरक में जाते हैं ॥ २८ ॥ जो ब्राह्मण वेद को पढ़ते हैं वा जो पंच महायज्ञों के करने में तत्पर हैं वे पांचो इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हों तो भी त्रिलोकी को तारने वाले ही हैं ॥२९॥ जैसे जलता हुआ अग्नि श्मशानों में मुर्दों का भक्षक होने पर भी संसार का उद्धार कर्त्ता