अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ५५
तत्पापंशतधाभूत्वा राजानमनुगच्छति ॥ ३७ ॥
प्रायश्चित्तंसदादद्याद्देवतायतनाग्रतः ।
आत्मकृच्छ्रंततःकृत्वा जपेद्वेवेदमातरम् ॥ ३८ ॥
सशिखंवपनंकृत्वा त्रिसंध्यमवगाहनम् ।
गवांमध्येवसेद्रात्रौ दिवागाश्चाप्यनुव्रजेत् ॥ ३६ ॥
उष्णेवर्षतिशीतेवा मारुतेवातिवाभृशम् ।
नकुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वातुशक्तितः ॥ ४० ॥
आत्मनोयदिवाऽन्येषां गृहेक्षेत्रेऽथवाखले ।
भक्षयन्तीनंकथयेत्पिबन्तंचैववत्सकम् ॥ ४१ ॥
पिवन्तांपुपिवेत्तोयं संविशन्तीमुपाविशेत् ।
पतितांपङ्कलग्नांवा सर्वप्राणैःसमुद्धरेत् ॥ ४२ ॥
ब्राह्मणार्थेगवार्थेवा यस्तुप्राणान्परित्यजेत् ।
मुच्यतेब्रह्महत्याया गोप्तागोर्ब्राह्मणस्यच ॥ ४३ ॥
गायधस्यानुरूपेण प्राजापत्यंविनिर्दिशेत् ।
द्वान् ब्राह्मणों का उल्लंघन करके राजा स्वयं किया चाहे तो वह पाप सौ गुणा होकर राजा को लगता है ॥ ३७ ॥ सदैव देवता के मन्दिर के आगे प्रायश्चित्त करावे। फिर वह विद्वान् भी अपना कृच्छ्र व्रत (प्रायश्चित्त) करके वेद की माता गायत्री का जप करे ॥ ३८ ॥ प्रायश्चित्त करने वाला शिखा सहित बालों का मुंडन कराके त्रिकाल स्नान करै । रात्रि को गौओं के बीच गोशाला में वसे और दिन में चरने को निकली गौओं के पीछे २ जंगल में भ्रमण करै ॥३९॥ अत्यन्त उष्णकाल (गर्मी) में, वर्षा में, शीतकाल में, और अत्यन्त पवन (आंधी) में अपनी रक्षा का उपाय तब करे जब शक्ति भर गौओं की रक्षा पहिले करलेवे ॥४०॥ अपने अथवा अन्य के घर में, खेत में अथवा खलियान में खाती हुई गौ को न स्वयं हटावे तथा न अन्य से हटाने को कहे और दूध पीते हुए बछड़े को भी किसी को न बतावे ॥ ४१ ॥ गौ ओं के जल पीने पर स्वयं जल पीवे, गौओं के बैठने पर स्वयं बैठे और गढ़े आदि में गिरी पड़ी वा कीचड़ में फसी गौ को संपूर्ण बल से उठावे निकाले ॥४२॥ जो कोई मनुष्य ब्राह्मण वा गौओं की रक्षा करने के लिये अपने प्राणों को देकर गौ और ब्राह्मण की रक्षा करै वह ब्रह्महत्यादि महापापों से भी शीघ्र ही छूट जाता है ॥४३॥ गौवध पाप के अनुसार निम्न चतुर्विधों में से उचित प्राजापत्य व्रत बतावे । उस