अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ पराशरस्मृतिः ॥
प्राजापत्यंतुयत्कृच्छ्रं विभजेत्तच्चतुर्विधम् ॥ ४४ ॥
एकाहमेकभक्ताशी एकाहंनक्तभोजनः ।
अयाचितञ्चै कमहरेकाहंमारुताशनः ॥ ४५ ॥
दिनद्वयंचैकभक्तो द्विदिनंनक्तभोजनः ।
दिनद्वयमयाचीस्याद् द्विदिनंमारुताशनः ॥ ४६॥
त्रिदिनंचैकभक्ताशी त्रिदिनंनक्तभोजनः ।
दिनत्रयमयाचीस्यात्त्रिदिनंमारुताशनः ॥ ४७ ॥
चतुरहंत्वेकभक्ताशी चतुरहंनक्तभोजनः ।
चतुर्द्दिनमयाचीस्याच्चतुरहंमारुताशनः ॥ ४८ ॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
विप्राणांदक्षिणां दद्यात्पवित्राणिजपेद्द्विजः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणान्भोजयित्वातु गोघ्नःशुद्ध्येन्नसंशयः ॥ ५० ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
कृच्छ्र व्रत को चार भाग में बांटे ॥ ४४ ॥ एक दिन प्रातः एक वार परिमित अन्न खावे, और एक दिन रात में भोजन करै, एक दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे और एक दिन सर्वथा निराहार रहे यह छोटा कृच्छ्र वा पादकृच्छ्र व्रत है ॥ ४५ ॥ दो दिन एकवार प्रातःकाल परिमित खावे, दो दिन रातमें परिमित भोजन करै, दो दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे, फिर दो दिन निराहार उपवास करे यह द्वितीय कक्षा का कृच्छ्र व्रत वा अर्द्ध कृच्छ्र जानो ॥ ४६ ॥ तीन दिन एकवार प्रातः खावे, तीन दिन रात में भोजन करै, तीन दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे फिर तीन दिन निराहार रहे यह तीसरा वा पौन कृच्छ्र व्रत है ॥ ४७ ॥ चार दिन एक वार प्रातः खावे, चार दिन रात में एक वार भोजन करै फिर चार दिन बिना मागे जो मिले उसे खावे और चार दिन निराहार रहे यह पूरा कृच्छ्र व्रत है ॥ ४८ ॥ प्रायश्चित्त के पूर्ण हुए पीछे यह द्विज ब्राह्मणादि अन्य सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन करावे दक्षिणा देवे और पवित्र वेद मन्त्रों ( गायत्री आदि ) को जपे ॥ ४९ ॥ ब्राह्मणों को भोजन करा कर गोवध का करने वाला शुद्ध हो जाता है इस में संदेह नहीं है ॥५०॥
यह पाराशरीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥