भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ५७

गवांसंरक्षणार्थाय न दुष्येद्वोधबन्धयोः । तद्वधंतुमतंविद्यात्कामाकामकृतंतथा ॥ १ ॥ दण्डादूर्ध्वंयदान्येन प्रहरेद्वानिपातयेत् । प्रायश्चित्तंचरेत्प्रोक्तं द्विगुणं गोवधेचरेत् ॥ २ ॥ रोधबन्धनयोक्त्राणि घातश्चेतिचतुर्विधम् । एकपादंचरेद्रोधे द्विपादंबन्धनेचरेत् ॥ ३ ॥ योक्त्रेषुतुत्रिपादंस्याच्चरेत्सर्वंनिपातने । गोचरेवागृहेवापि दुर्गेष्वप्यसमस्थले ॥ ४ ॥ नदीष्वथसमुद्रेषु खातेष्वथदरीमुखे । दग्धदेशेस्थितागावः स्तम्भनाद्रोधउच्यते ॥ ५ ॥ योक्त्रदामकडोरैश्च कण्ठाभरणभूषणैः । गृहेवापिवनेवापि बद्धास्याद्गौर्मृतायदि ॥ ६ ॥ तदेवबन्धनंविद्यात्कामाकामकृतंचयत् ।


गौओं की रक्षा के लिये रोकने और बांधने में यदि गौ मरजाय तो उसको गोवध नहीं जानना, चाहे वह रोकने बांधने की इच्छा से भी हुआ हो ॥१॥ दंड से भिन्न यदि किसी औजार से गौ को मारे वा गिरा देवे तो वह गोवध में कहे से दूना प्रायश्चित्त करै ॥ २ ॥ रोकने, बंध बांधने, जोतने, और मारने से इन चार प्रकारों से गोहत्या होती है । परन्तु ये काम कष्ट पहुंचाने की इच्छा से निर्दय होकर किये गये हों तब यदि रोकने से गोहत्या हुई हो तो एक पाद, बंधन से हुई हो तो दो पाद ॥ ३ ॥ योक्त्र से गोहत्या होने पर तीनपाद, और मारने से हुई गोहत्या में (अ० ८ के श्लोक ४४ से ५० तक में कहा) संपूर्ण प्रायश्चित्त करै। गौओं के चरने को रखाये बाड़ा में, घर में, दुर्ग (जहां निकलने पैठने का रास्ता न हो) में, और ऊंची नीची जगह में, ॥ ४ ॥ नदीयों में, समुद्र में, गड्डों में, गुफा के मुख में, जले तपे हुए स्थान में, इन जगहों में खड़ी हुई गौओं को रोकने से रोध द्वारा मरना कहते हैं ॥ ५ ॥ यदि जुए में वा रस्सी से बांधा हो, घंटारों की रस्सी से वा आभूषण की रस्सी से घर में वा वन में बंधी हुई गौ यदि मरजाय तो ॥ ६ ॥ अवस्था भेद से उस को कामकृत वा अकामकृत हत्या कहते हैं। यदि हल में, वा गाड़ी में, वा