अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ पराशरस्मृतिः ॥
ननारिकेलैर्नचशाणवालैर्नचापिमौञ्जैर्नचवल्कशृङ्खलैः। एतैस्तुगावो ननिबन्धनीया बद्ध्वातुतिष्ठेत्परशुंगृहीत्वा ॥३३॥ कुशैःकाशैश्चबध्नीयाद्गोपशुंदक्षिणामुखम् । पाशलग्नाग्निदग्धेषु प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ३४ ॥ यदparentit-यदि तत्रभवेत्काण्डं प्रायश्चित्तंकथंभवेत् । जपित्वापावनींदेवीं मुच्यतेतत्रकिल्विषात् ॥ ३५ ॥ प्रेरयन्कूपवापीषु वृक्षच्छेदेषूपातयन् । गवाशनेषुविक्रीणंस्ततःप्राप्नोतिगोवधम् ॥ ३६ ॥ आराधितस्तुयःकश्चिद् भिन्नकक्षोयदाभवेत् । श्रवणंहृदयंभिन्नं मग्नोवाकूपसंकटे ॥ ३७ ॥ कूपादुत्क्रमणेचैव भग्नोवाग्रीवपादयोः । सएवम्रियतेतत्रत्रीन्पादांस्तुसमाचरेत् ॥ ३८ ॥
नारियल की, शण की, बालों की, मूंज की, तथा बक्कल की रस्सी से और लोहे की सांकल से इन सब से गौ को नहीं बांधना चाहिये। यदि कदाचित् इन से बांधे तो हाथ में फरसा लिये गौ के समीप रक्षार्थ खड़ा रहे ॥ ३३ ॥ किन्तु कुशों तथा कांसों की रस्सी से दक्षिणा को मुख करके गौ को बांधे। कुशादि की रस्सी से रक्षार्थ बांधने पर फांसी लगजाय वा अग्नि लग कर गौ बैल जल जाय तो प्रायश्चित्त नहीं करने पड़ेगा क्योंकि बांधने वाले का दोष नहीं है ॥ ३४ ॥ यदि वहां सरपता का ढेर लगा हो और उस में अग्नि लगकर गौ जल जावे तो प्रायश्चित्त कैसे हो? इस का उत्तर यह है कि वहां जगतपावनी गायत्री का जप करके उस पाप से छूट जाता है ॥ ३५ ॥ कुआ वा बाउली में घुमाने की प्रेरणा करता हुआ, कटे हुए पड़े वृक्षों पर घेर २ कर गिराते हुए गौ मर जावे वा गोभक्षक कसाई आदि के हाथ बेंचने पर गोहत्या लगती है ॥ ३६ ॥ यदि उक्त हालत में गौके बचाने का उपाय करने पर भी उस की कोख फटजाय, कान टूट जाय, हृदय फटजाय, वा कुए में डूब कर मरजाय ॥ ३७ ॥ अथवा कुए पर इधर से उधर फंदाने से भी उस बैल की गर्दन वा टांग टूट जावे और इसी कारण यदि वह मर जाय तो त्रिपाद (तीन हिस्सा) प्रायश्चित्त करे ॥ ३८ ॥