भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

६४ पराशरस्मृतिः ॥

यन्त्रितागौश्चिकित्सार्थं मूढगर्भविमोचने । यत्नेकृतेविपद्येत प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४५ ॥ व्यापन्नानांबहूनांचरोधनेबन्धनेपिवा । भिषङ्मिथ्याप्रचारेण प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४६ ॥ गोवृषाणांविपत्तौच यावन्तःप्रेक्षकाजनाः। अनिवारयतांतेषां सर्वेषांपातprefixकं भवेत् ॥ ४७ ॥ एकोहतोयैर्बहुभिःसमेतैर्नज्ञायतेयस्यहतोभिघातात् । दिव्येनतेषामुपलभ्यहन्ता,निवर्त्तनीयोनृपसन्नियुक्तैः ४८ एकाचेद्बहुभिःकाचिद्दैवाद्व्यापादिताक्वचित्। पादंपादंतुहत्यायाश्चरेयुस्तेपृथक्पृथक् ॥ ४९ ॥ हतेतुरुधिरंदृश्यं व्याधिग्रस्तःकृशोभवेत् । ग्रासार्थंचोदितोवापि अध्वननैवगच्छति ।


यदि दवाई करने के लिये गौ को रस्सी से बांध कर गिराने से, और अटके हुए गर्भ को निकालने से उपाय करने पर भी गौ मरजाय तो गोहत्या का दोष नहीं लगेगा ॥ ४५ ॥ यदि बहुतों को एक साथ थोड़ी जगह में रोकने वा बांधने पर अनेक गौ मरजावें । अथवा वैद्य डाक्टरादि की विरुद्ध हानिकारफ दी ओषधि से गौ मरजांवे तो प्रायश्चित्त यथोचित करना चाहिये ॥४६॥ जहां गौ वा बैल मारे पीटे वा वध किये जाते हों तत्र जितने देखने वाले ब्राह्मणादि सनातनधर्मी देखते रहें वा सुनते जानते रहें और गोहत्या का निवारण न करें तो गोहत्या का पाप सब को लगता है ॥ ४७ ॥ एक मनुष्य वा पशु को इकट्ठे हुए बहुतों ने मारा हो पर यह न जानपड़े कि किन की चाट से मारा गया तो वहां अग्नि का गोला हाथ पर रखना आदि दिव्य उपाय से अपराधी को जानकर राजकर्मचारी राजदण्ड दिलावें ॥ ४८ ॥ यदि एक गौ को बहुत मनुष्यों ने मिलकर मारा हो तो हत्या का चौथाई २ प्रायश्चित्त सब करें ॥ ४९ ॥ कोई गौ मारी पीटी गई हो तो रुधिर निकलने से, वा रोग से दुबली हो जावे, वा दाना घास आदि खिलाने पर भी न खावे, वा मार्गमें हांकने पर भी न चले और फेन गिरावे तो जान लेकि गौ को किसी ने मारा पी