अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ६५
लालाभ्रतिदृष्टेषु एवमन्वेषणंभवेत् ॥ ५० ॥
मनुनाचैवमेकेन सर्वशास्त्राणिजानता ।
प्रायश्चित्तंतुतेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ ५१ ॥
केशानांरक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ।
द्विगुणेव्रतआदिष्टे दक्षिणाद्विगुणाभवेत् ॥ ५२ ॥
राजावाराजपुत्रोवा ब्राह्मणोवाबहुश्रुतः ।
अकृत्वावपनंतेषां प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ५३ ॥
यस्यनद्विगुणन्दानङ्केशश्चपरिरक्षितः ।
तत्पापंतस्यतिष्ठेत वक्ताचनरकंव्रजेत् ॥ ५४ ॥
यत्किंचित्क्रियतेपापं सर्वंकेशेषुतिष्ठति ।
सर्वान्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥ ५५ ॥
एवंनारीकुमारीणां शिरसोमुण्डनंस्मृतम् ।
नस्त्रियाःकेशवपनं नदूरे शयनासनम् ॥ ५६ ॥
नचगोष्ठेवसेद्रात्रौ नदिवागाअनुव्रजेत् ।
टा है ॥ ५० ॥ धर्म शास्त्रों का मर्म जानने वाले एक मनुजी ने गोहत्या करने वाले को चान्द्रायण व्रत प्रायश्चित्त कहा है ॥ ५१ ॥ यदि कोई मनुष्य प्रायश्चित्त में शिर के बाल न मुंडाना चाहे तो उसे दूना प्रायश्चित्त व्रत करना चाहिये । और उस में दक्षिणा भी द्विगुणी देनी चाहिये ॥ ५२ ॥ ऐसे द्विगुण प्रायश्चित्त करने वालों को राजा, वा राजपुत्र अथवा बहुत शास्त्रों को जानने वाला ब्राह्मण विद्वान् प्रायश्चित्त करावे ॥ ५३ ॥ जो अपराधी शिर के बाल न मुंडावे और दक्षिणा भी दूनी न देवे उस का पाप प्रायश्चित्त से निवृत्त नहीं होता किन्तु पाप वैसा ही बना रहता है । और प्रायश्चित्त बताने वा कराने वाले को भी नरक होता है ॥ ५४ ॥ जो कुछ पाप किया जाता है वह सब बालों में ठहरता है । इस लिये जो कोई प्रायश्चित्ती केश न मुंडाना चाहे वह भी शिर के सब बालों को इकट्ठा करके ऊपर से दो अंगुल पुछल्ला कटा देवे ॥ ५५ ॥ यदि स्त्री वा कुमारी कन्या को किसी अपराध में प्रायश्चित्त करना पड़े तो स्त्री के शिर के बाल न मुड़ावे किन्तु सब बाल इकट्ठे करके ऊपर से दो अंगुल कटवा देवे । और प्रायश्चित्त के लिये स्त्री अपने घर से दूर कहीं एकान्त में अकेली न सोवे न निवास करे ॥ ५६ ॥ प्रायश्चित्त के समय स्त्री