भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

६६ पराशरस्मृतिः ॥

नदीपुसंगमेचैव अरण्येषुविशेषतः ॥ ५७ ॥ नस्त्रीणामजिनंवासो व्रतमेवंसमाचरेत् । त्रिसंध्यंस्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनंतथा ॥ ५८ ॥ बन्धुमध्येव्रतंतासां कृच्छ्रचान्द्रायणादिकम् । गृहेषुसततंत्तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् ॥ ५९ ॥ इहयोगोवधंकृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति । सयातिनरकंधोरं कालसूत्रमसंशयम् ॥ ६० ॥ विमुक्तोनरकात्तस्मान्मर्त्यलोकेप्रजायते । क्लीबोदुःखीचकुष्ठीच सप्तजन्मानिवैनरः ॥ ६१ ॥ तस्मात्प्रकाशयेत्पापं स्वधर्मंसततंचरेत् । स्त्रीबालभृत्यगोविप्रेष्वतिकोपंविवर्जयेत् ॥ ६२ ॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥


रात को गोशाला में भी न बसे, न दिन में गौओं के पीछे २ जंगल में जावे, नदियों में तथा नदी के संगम पर भी स्नान को अकेली न जावे और एकान्त बन में भी न रहे ॥ ५७ ॥ प्रायश्चित्त में स्त्रियों के लिये मृग चर्म धारण का भी निषेध है किन्तु स्त्री तीन बार स्नान करे और देवताओं की प्रतिमाओं का पूजन करती हुई प्रायश्चित्त व्रत पूरा करे ॥ ५८ ॥ स्त्रियों को भाई बन्धुओं के बीच अपने घर में कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रत करना उचित है । निरन्तर अपने घर में ही रहे और शुद्धि आदि के नियमों का पालन ब्रह्मचर्य रखती हुई करे ॥ ५९॥ इस जगत् में जो कोई पुरुष गोवध करके छिपाना चाहता है वह अवश्यमेव काल सूत्र नामक घोर नरक को प्राप्त होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ६० ॥ वह गोहिंसक पुरुष उस नरक से छूटने पर मनुष्य लोक में जन्म लेता है । तब सात जन्मों तक नपुंसक तथा कोढ़ी होता हुआ अनेक बड़े २ कठिन दुःख पाता है । इससे गोहत्या बन पड़े तो उसे न छिपा कर प्रायश्चित्त अवश्य करे ॥ ६१ ॥ तिस से गोहत्यादि पाप को प्रकाशित करे और अपना धर्म निरन्तर करे । स्त्री, बालक, अपना दास, गौ और ब्राह्मणों पर अत्यन्त क्रोध कदापि न करे ॥ ६२ ॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवम अध्याय पूरा हुआ ॥