अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ६१
चातुर्वर्ण्येषुसर्वेषु हितांवक्ष्यामिनिष्कृतिम् । अगम्यागमनेचैव शुद्धौचान्द्रायणंचरेत् ॥ १ ॥ एकैकंह्रासयेद्ग्रासं कृष्णेशुक्लेचवर्द्धयेत् । अमावास्यांनभुञ्जीत ह्येषचान्द्रायणेविधिः ॥ २ ॥ कुक्कुटाण्डप्रमाणंतु ग्रासंवैपरिकल्पयेत् । अन्यथाभावदुष्टस्य नधर्मोनचशुद्ध्यति ॥ ३ ॥ प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्। गोद्वयंवस्त्रयुग्मंच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ४ ॥ चाण्डालींवाश्वपाकींवा अनुगच्छतियोद्विजः । त्रिरात्रमुपवासीस्याद् विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥ सशिखंवपनंकृत्वा प्राजापत्यत्रयंचरेत् । ब्रह्मकूर्चंततःकृत्वा कुर्याद्ब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥ गायत्रींचजपेन्नित्यं दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ।
सब ब्राह्मणादि चारों वर्गों के लिये हितकारी प्रायश्चित्त इस अगले दशवें अध्याय में हम कहेंगे । अगम्या स्त्री के साथ गमन करने पर शुद्धि के लिये चान्द्रायण व्रत करे ॥ १ ॥ जिस मास में चान्द्रायण करे तब पौर्णमासी को १५ ग्रास खाकर कृष्ण प्रतिपदा से एक २ ग्रास घटाता जाय फिर अमा-वस्या को कुछ न खाय निराहार रहे फिर शुक्ल प्रतिपदा को एक द्विती-या को दो ग्रास खाय ऐसे ही प्रति दिन एक २ बढ़ा के पौर्णमासी को फिर १५ ग्रास खावे यही चान्द्रायण का विधान है ॥२॥ मुरगा के अण्डा के बराबर एक ग्रास का प्रमाण जाने। जिस का मन छल कपटादि से दूषित हो वह धर्म करने योग्य नहीं और न उस की प्रायश्चित्तों से शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ प्राय-श्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे । तथा दो गौ और दो वस्त्र ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ४ ॥ चाण्डाली वा डोमिनी स्त्री से जो ब्राह्मण समागम करै वह ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर प्रथम तीन दिन रात उपवास करे ॥ ५ ॥ फिर शिखा सहित शिर के बाल मुंडा के दो प्राजापत्य व्रत करे । तदनन्तर ब्रह्मकूर्च व्रत करके ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ६ ॥ नित्य गायत्री