भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

६८ पराशरस्मृतिः ॥

विप्रायदक्षिणांदद्याच्छुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७ ॥ क्षत्रियोवाऽथवैश्योवा चाण्डालींगच्छतोयदि । प्राजापत्यद्वयंकुर्याद् दद्याद्गोमिथुनंतथा ॥ ८ ॥ श्वपाकीमथचाण्डालीं शूद्रोवैयदिगच्छति । प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ्रं चतुर्गोमिथुनंददेत् ॥ ९ ॥ मातरंयदिगच्छेत्तु भगिनींस्वसुतांतथा । एतास्तुमोहितोगत्वा त्रीणिकृच्छ्राणि संचरेत् ॥ १० ॥ चान्द्रायणत्रयंकुर्याच्छिश्नच्छेदेनशुद्ध्यति । मातृष्वसृगमेचैव आत्ममेढ्रनिकृन्तनम् ॥ ११ ॥ अज्ञानेनतुयोगच्छेत्कुर्याच्चान्द्रायणद्वयम् । दशगोमिथुनंदद्याच्छुद्धिंपाराशरोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥ पितृदारान्समारुह्य मातुराप्तांचभ्रातृजाम् ।

का जप किया करे । दो गो दो बैल ब्राह्मण को दक्षिणा में देवे तो इतने प्रायश्चित्त से निःसन्देह शुद्ध हो जाता है ॥ ७ ॥ क्षत्रिय वा वैश्य पुरुष यदि चाण्डाली से गमन करे तो दो प्राजापत्य व्रत करके दो गौ दो बैल दक्षिणा में देवे और ब्रह्मभोज करावे ॥ ८ ॥ डोमिनी वा चाण्डाली के साथ यदि शूद्र पुरुष गमन करे तो एक प्राजापत्य कृच्छ्र व्रत करे और चार गौ चार बैल दक्षिणा देवे ॥ ९ ॥ माता, भगिनी, तथा अपनी पुत्री से जो पुरुष मोहा-ज्ञानग्रस्त हो के गमन करे तो तीन कृच्छ्रव्रत करे ॥ १० ॥ फिर तीन चान्द्रायण व्रत तीन मास तक करे तब शिश्न (लिङ्गेन्द्रिय) को काट डालने पर शुद्ध होता है। और मातृष्वसा (मौसी) से गमन करने पर भी अपने इन्द्रिय का छेदन करे काट डाले ॥ ११ ॥ और यदि अज्ञान से ऐसा पूर्वोक्त काम करे तो दो मास तक दो चान्द्रायण व्रत करे और दशगौ दश बैल दक्षिणा में देवे। यह शुद्धि महर्षि पराशर ने कही है ॥ १२ ॥ जो पुरुष पिता की अन्य किसी स्त्री (जो अपनी उत्पादिका माता न हो) से गमन करे वा माता की सगी भतीजी से गमन करे वा गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भ्रातृ