अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७० पराशरस्मृतिः
सशिखंवपनंकृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् । त्रिरात्रमुपवासित्वा त्वेकरात्रंजलेवसेत् ॥ २० ॥ शंखपुष्पीलतामूलं पत्रंवाकुसुमंफलम् । सुवर्णंपञ्चगव्यंच क्वाथयित्वापिबेज्जलम् ॥२१॥ एकभक्तंचरेत्पञ्चाद्यावत्पुष्पवतीभवेत् । व्रतंचरतिद्यावत्तावत्संवसतेबहिः ॥ २२ ॥ प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् । गोद्वयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ॥ २३ ॥ चातुर्वर्ण्यस्यनारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणव्रतम् । यथाभूमिस्तथानारी तस्मात्तांनतुदूषयेत् ॥ २४ ॥ बन्दिग्राहेणयाभक्ता हृत्वाबद्ध्वायलाद्भयात् । कृत्वासांतपनंकृच्छ्रं शुद्ध्येत्पाराशरोऽब्रवीत् ॥ २५ ॥ सकृद्भुक्तातयानारी नेच्छन्तीपापकर्मभिः।
फिर शिखा सहित सब बाल मुंडा के कुलथी और भात खावे । फिर तीन दिन रात उपवास करके एक दिन रात जल के भीतर बसे ॥२०॥ फिर शंखाहूलो घास की जड़, पत्ते, फूल वा फलों को और सुवर्ण तथा पञ्चगव्य इन सब का काढा बनाकर जल पीवे ॥ २१ ॥ फिर जबतक रजस्वला हो तब तक एकबार भोजन करे भूमि पर सोवे । और जबतक इस व्रत को करे तबतक घरसे पृथक् घरके किसी भाग में बसे ॥ २२ ॥ फिर प्रायश्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे और दो गौ दक्षिणा में देवे यह शुद्धि महर्षि पराशर ने कही है।२३। चारो वर्ण की स्त्रियों के लिये दोष लगने पर कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है क्योंकि स्त्री भूमि के समान है इस से वह सर्वथा त्याज्य नहीं होती है ॥२४॥ यदि किसी पुरुष ने मारपीट कर वा बांधकर वा मारडालनेका भय दिखाकर वा जबरदस्ती से हाथ पांव बांध कर स्त्री से दुराचार किया हो तो वह स्त्री सान्तपन कृच्छ्र व्रत करके शुद्ध होती है यह पाराशर जी ने कहा है ॥२५॥ पापकमी व्यभिचारियों ने जिस इच्छा न रखती हुई शुद्ध स्त्री से एकवार दुराचार किया हो वह प्राजापत्य व्रत करने और रजस्वला होने से शुद्ध