अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसंहिता ॥ ७१
प्राजापत्येनशुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेनच ॥ २६ ॥
पतत्यर्द्धंशरीरस्य यस्यभार्यासुरांपिबेत् ।
पतिताद्र्द्धशरीरस्य निष्कृतिर्नविधीयते ॥ २७ ॥
गायत्रींजपमानस्तु कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ।
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ॥ २८ ॥
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ॥ २९ ॥
जारेणजनयेद्गर्भं मृतेत्यक्तेगतेपतौ ।
तांत्यजेदपरेराष्ट्रे पतितांपापकारिणीम् ॥ ३० ॥
ब्राह्मणीतुयदागच्छेत्परपुंसासमन्विता ।
सातुनष्टाविनिर्दिष्टा नतस्यागमनंपुनः ॥ ३१ ॥
कामान्मोहाच्चयागच्छेत्त्यक्त्वाबन्धून्सुतान्पतिम् ।
साऽपिनष्टापरेलोके मानुषेषुविशेषतः ॥ ३२ ॥
होती है ॥२६॥ जिस द्विज की स्त्री मद्य पीतीहै उसका आधा अङ्ग पतित हो जाता है । और जिस का आधा शरीर पतित हो गया उसका यद्यपि कोई प्रायश्चित्त नहीं है ॥२७॥ तथापि गायत्री को जपता हुआ कृच्छ्र सान्तपन व्रत करे ॥ २८ ॥ गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, और कुश पीसकर निकाला जल इन सब को मिलाकर एकदिन खावे और एकदिन उपवास करे तो यह कृच्छ्र सान्तपन व्रत कहाता है ॥२९॥ जो स्त्री अपने पति के त्याग देने पर, पति के कहीं चले जाने पर, वा पति के मर जाने पर, अन्य जार पुरुष से व्यभिचार द्वारा सन्तान पैदा कर लेवे उस पतित हुई पापिनि स्त्री को राजा स्वदेश से निकाल दे अन्य किसी राज्य में भेज देवे ॥ ३० ॥ यदि कोई ब्राह्मणी अन्य पुरुष के साथ मेल करके अपने घर से भाग जावे तो उस को नष्ट भ्रष्ट जानो । वह फिर प्रायश्चित्त द्वारा भी ग्राह्य नहीं है ॥३१॥ जो स्त्री किसी पुरुष पर कामासक्त होके वा अज्ञान रूप मोह से, अपने पति, पुत्रों और बन्धुओं को त्याग केकसी अन्य पुरुष के साथ निकल जावे वह भी परलोक से नष्ट होती उस का परलोक बिगड़ जाता और विशेष कर यह लोक तो बिगड़ता ही है ॥ ३२ ॥